1872 में शिमला में स्थापित हुई केंद्रीय प्रेस शिमला 145 साल तक सेवाएं देने के बाद बंद होने जा रही है। केंद्र सरकार ने शिमला समेत 12 जगह स्थापित केंद्रीय प्रेस बंद कर उन्हें बाकी संचालित 5 प्रेस में मर्ज करने का फैसला लिया है। विधानसभा चुनाव से ऐन पहले मोदी सरकार के इस फैसले से एक अध्याय इतिहास बनकर समाप्त होने जा रहा है।
अंग्रेजों के जमाने में स्थापित हुई केंद्रीय प्रेस को भारत की सबसे पुरानी प्रेस में से माना जाता है। इस प्रेस में अंग्रेजी सरकार के कई महत्वपूर्ण और गोपनीय दस्तावेजों के प्रकाशन के अलावा आजाद भारत के संविधान के भी कुछ हिस्से भी छापे गए।
इसके अलावा इनमें देश हित से जुड़े अलग-अलग विभागों जैसे रक्षा, वित्त और अन्य विभागों के गोपनीय और महत्वपूर्ण छपाई के कार्य किये जाते हैं। प्रेस में काम करने वाले मोहन दत्त बताते हैं कि इस प्रेस में ऐसे महत्वपूर्ण दस्तावेज प्रकाशित होने के बावजूद
आज तक कभी भी किसी तरह की लीक होने की बात सामने नहीं आई। मोहन ने बताया कि प्रेस को बंद करने से 98 कर्मचारी प्रभावित होंगे। उन्होंने कहा कि सरकार ने अगर फैसला वापस नहीं लिया तो वे आंदोलन करने को बाध्य होंगे।
सीपीएम ने जताई प्रेस बंद करने के फैसले पर नाराजगी
भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) ने केंद्रीय प्रिंटिंग प्रेस को बंद करने के निर्णय का विरोध किया है। सीपीएम ने फैसले को तुरंत बदलने की मांग की है। माकपा नेता संजय चौहान ने कहा कि केंद्र सरकार का ये फैसला कर्मचारी विरोधी है।
पार्टी का मानना है कि केन्द्र ये निर्णय देश में नवउदारवादी नीतियों को लागू करने के लिए ले रही है। इन नीतियों के चलते सार्वजनिक और सरकारी क्षेत्र के सामरिक संस्थानों को बंद कर निजी क्षेत्र को बढ़ावा दिया जा रहा है।
दो बार पहले भी हो चुके फैसले
केंद्रीय प्रिंटिंग प्रेस में 1980 में कर्मचारियों की संख्या 868 थी जो आज केवल 98 रह गई है। ये पहली बार नहीं है जब प्रेस को बंद करने का प्रयास किया जा रहा है। 1986 में केंद्र की तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने भी इसको बंद करने का प्रयास किया था।
वर्ष 2002 में तत्कालीन वाजपेयी सरकार ने भी इसे बंद करने का निर्णय ले लिया था किंतु कर्मचारियों के संघर्ष और विरोध के चलते इन निर्णयों को सरकारों को वापस लेना पड़ा था।