वर्तमान समय में शून्य लागत प्राकृतिक कृषि की उपयोगिता काफी बढ़ गई है। इस पद्धति से जहाँ किसानों की आय बढ़ाकर उन्हें गलत कदम उठाने से बचाया जा सकता है। एक देसी गाय से 30 एकड़ भूमि पर कृषि की जा सकती है।
इससे 70 फीसदी पानी की भी बचत होगी। वहीं जमीन की उर्वरा शक्ति को बढ़ाने, उत्पादन कई गुना करने, पानी की कम खपत और राष्ट्र को उन्नति की ओर ले जाया जा सकता है।
यह बात हिमाचल के राज्यपाल आचार्य देवव्रत ने वीरवार को नई दिल्ली स्थित लोकसभा के बीपीएसटी मेन लेक्चर हॉल में जैविक कृषि पर आयोजित कार्यशाला के दौरान कही। राज्यपाल ने कहा कि जैविक खेती स्वास्थ्य की दृष्टि से भी बेहद फायदेमंद है।
राज्यपाल ने कहा कि हिमाचल प्रदेश में उन्होंने सामाजिक सरोकार के छह विषयों को लेकर अभियान चलाए हैं जिनमें प्राकृतिक कृषि भी शामिल है। उन्होंने कहा कि आज देश की जनसंख्या करीब 130 करोड़ है और खाद्यान्न उत्पादन करीब 27.5 करोड़ टन।
वर्ष 2050 तक जब जनसंख्या 170 करोड़ हो जाएगी तो खाद्यान्न उत्पादन 35 करोड़ टन करना पड़ेगा। उन्होंने कहा कि वर्तमान में दो प्रकार की कृषि की जा रही है जिनमें रासायनिक खेती और जैविक खेती शामिल है।
लेकिन ये सिद्ध हो चुका है कि दोनों ही प्रकार की खेती हमारे लक्ष्य को प्राप्त नही कर सकती। कहा कि रासायनिक खेती अपनाने से भूमि जल दूषित हुआ है। उत्पादकता घटी है और किसानों का खर्चा बढ़ा है।
वहीं, दूसरी ओर जैविक खेती से पहले तीन सालों तक उत्पादन कम होता है और पोषक तत्व जमीन से खींचता है और व्यवहारिकता में अपनाना कठिन है। कहा कि प्रधानमंत्री ने वर्ष 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने की दिशा में प्रयास भी चल रहा है।
इस लक्ष्य को हम शून्य लागत प्राकृतिक कृषि से ही प्राप्त कर सकते हैं। कार्यशाला में इससे पूर्व कृषि विशेषज्ञ शरद मराठे, अरुण दिके तथा सीएमडी भारत विकास ग्रुप हनुमंत राव ने भी अपने विचार रखे।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन ने राज्यपाल व अन्य वक्ताओं का स्वागत किया। कार्यशाला के दौरान कई सांसदों के अलावा एसआरआई के पदाधिकारी भी इस अवसर पर उपस्थित थे।