हिमाचल प्रदेश में ठोस कचरा संयंत्र स्थापित न करने के मामले की सुनवाई 10 जनवरी निर्धारित की गई है। पर्यावरण मानकों के आधार पर ठोस कचरा संयंत्र स्थापित न करने पर हाईकोर्ट ने कड़ा संज्ञान लिया है। अदालत ने सभी प्रोजेक्ट अधिकारियों को संयुक्त रिपोर्ट दायर करने के आदेश दिए हैं। बता दें कि अदालत के समक्ष हिमाचल के अलग-अलग हिस्सों से अपशिष्ट प्रबंधन, ठोस अपशिष्ट स्थापित करने के लिए स्थल विवाद और अनुपचारित सीवरेज और ठोस अपशिष्ट की रिहाई से जुड़ी याचिकाएं दर्ज की गई हैं। अदालत ने इन मामलों में प्रमुख सचिव (वन), प्रधान सचिव (उद्योग), प्रधान सचिव (कृषि), प्रधान सचिव (जल शक्ति विभाग), प्रधान सचिव (स्वास्थ्य), प्रधान सचिव (ग्रामीण विकास और पंचायतीराज) और हिमाचल पथ परिवहन निगम को प्रतिवादी बनाया है। प्रदेश में ठोस अपशिष्ट प्रबंधन और इसके कार्यान्वयन पर अदालत को बताया गया कि हिमाचल प्रदेश 59 शहरी समूह के साथ भारत का सबसे अच्छा शहरीकृत राज्य है, लेकिन कचरे की कम मात्रा भी गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं पैदा कर सकती हैं।
बद्दी में 970 करोड़ रुपये की लागत से बनने वाले ठोस अपशिष्ट प्रबंधन को स्थापित करने के लिए कोई कदम नहीं उठाए गए हैं। नगर निगम धर्मशाला में कचरे को अनुपचारित तरीके से निष्पादन किया जा रहा है। इसी तरह सोलन में भी कचरे से निपटने के लिए कोई विशेष प्रावधान नहीं बनाया गया है। किन्नौर में एक करोड़ रुपये की लागत से कचरे के निष्पादन के लिए मशीन लगाई गई है, लेकिन कई वर्षों से यह बेकार पड़ी है। हिमाचल में 29 नगर परिषद और 5 नगर निगम है। कहीं भी कचरे का नियमानुसार निष्पादन नहीं किया जा रहा है। मामले की गंभीरता को देखते हुए अदालत ने सभी प्रोजेक्ट अधिकारियों को आदेश दिए है कि वे प्रतिवादियों से समन्वय करे और अदालत के समक्ष विस्तृत और संयुक्त रिपोर्ट दायर करें।