तो क्या फोन सिग्नल के लिए फॉरेस्ट गार्ड होशियार सिंह जहर खाने के बाद पेड़ पर चढ़ा? होशियार सिंह की मौत की जांच के लिए गठित स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (एसआईटी) ने वीरवार को इस थ्योरी पर भी पड़ताल की। जांच टीम को आशंका है कि कहीं मरने से पहले होशियार ने किसी को कॉल करने का प्रयास तो नहीं किया।
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चूंकि, होशियार की कॉल डिटेल में 5 जून के बाद से कोई भी कॉल नहीं की गई। जहां उसकी लाश मिली है, वह काफी सुदूरवर्ती इलाका है। ऐसे में कहीं ऐसा तो नहीं कि फोन सिग्नल के लिए वह पेड़ पर चढ़ा था। इस थ्योरी के सही या गलत होने के लिए टीम ने टेलीकॉम कंपनी से संपर्क साधा है।
कंपनी की मदद से यह पता किया जा रहा है कि कहीं पेड़ के उस या उससे ऊंचे हिस्से में सिग्नल तो नहीं आता। चूंकि, मृतक की जेब से मोबाइल फोन बरामद हुआ है, इसलिए जांच टीम इस एंगल को जांच रही थी। हालांकि, अब मामला सीआईडी को ट्रांसफर कर दिया गया है लेकिन पुलिस इस थ्योरी पर मिली जानकारी को भी सीआईडी को सौंपेगी।
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उल्टे लटकना, अब तक बना हुआ है रहस्य
दरअसल, एसआईटी वैसे तो होशियार की मौत के हर पहलू पर काम कर रही है लेकिन मृतक के बैग से मिली डायरी व नोट्स के आधार पर प्रारंभिक तौर पर आत्महत्या की थ्योरी पर फोकस कर रही थी। चूंकि नोट्स और डायरी में दर्ज जानकारी आत्महत्या की और इशारा कर रही है लेकिन उसके पेड़ पर चढ़ने और लाश के उल्टे लटकने के मूल सवाल की गुत्थी अब तक रहस्य बना हुआ है।
जांच टीम ने इस बात का पता लगाने का प्रयास किया है कि आखिर होशियार पेड़ पर क्यों चढ़ा? इसमें जहरीला पदार्थ खाने के बाद गर्मी और शरीर के अंदर के केमिकल बदलावों से लेकर कॉल डिटेल रिकॉर्ड को भी छाना। जहरीले पदार्थ के असर और प्रभाव की जानकारी के लिए डॉक्टरों की मदद ली जा रही है।
वहीं, फोन मिलाने के लिए पेड़ पर चढ़ने के एंगल पर भी पुलिस तकनीकी पड़ताल कर रही है। मौके से बरामद होशियार के फोन को भी टटोला जा रहा है। देखा जा रहा है कि सिग्नल न आने के बावजूद क्या होशियार ने किसी को कॉल करने का प्रयास किया था। अगर किया था, तो कहीं वह कॉल मिलाने और सिग्नल पकड़ने के लिए पेड़ पर तो नहीं चढ़ा था।
मरने से दो दिन पहले खाया था आखिरी बार खाना
जांच के दौरान फोरेंसिक रिपोर्ट से यह बात भी सामने आई है कि आखिरी बार होशियार ने 5 जून को खाना खाया था। आखिरी बार जिस शिक्षक पवन के साथ होशियार ने जो खाना खाया था, वह फोरेंसिक रिपोर्ट से मिल रहा है।
साफ है कि वह मरने से दो दिन पहले तक खाली पेट था। ऐसे में इस बात की प्रबल आशंका है कि जहरीला पदार्थ खाते ही उसने उसके शरीर पर जबरदस्त हमला किया होगा। हालांकि, अभी भी टीम विस्तृत रिपोर्ट के आने का इंतजार कर रही है।
150 रुपये टीए पर 1500 हेक्टेयर की निगरानी
चार दिन लापता रहने के बाद पेड़ पर लटके मिले फॉरेस्ट गार्ड होशियार सिंह के शव ने विभागीय कार्यशैली पर सवाल खड़े कर दिए हैं। विभाग के 1500 हेक्टेयर क्षेत्रफल वन क्षेत्र की गश्त के लिए एक गार्ड को डेढ़ सौ रुपये दिए जाते हैं। जंगल में खूंखार जानवरों के साथ वन माफिया से लोहा लेने के लिए एक लकड़ी का डंडा है।
खतरे की घड़ी में आपस में संपर्क साधने को न तो वॉकी टॉकी है और न ही वाहन। सरकार के बेहतर सुविधाओं के दावों की पोल जंगल के जोखिम भरे हालात खोल रहे हैं। गार्डों की कर्मचारी यूनियनें कई बार विभाग से संसाधन बढ़ाने की मांग करती रही हैं, लेकिन किए गए वादे और दावे आज तक धरातल पर नहीं उतरे हैं।
प्रदेश में करीब सत्रह सौ से ज्यादा बीट हैं। औसतन डेढ़ हजार हेक्टेयर क्षेत्र में गश्त कर उसे वन माफिया से बचाने की जिम्मेदारी संभालने वाले प्रदेश के हर फॉरेस्ट गार्ड को महज डेढ़ सौ रुपये महीने बतौर टीए मिलता है। होशियार सिंह के लापता होने पर चार दिन तक यही पता नहीं चल सका कि वह जिंदा है या मर गया।
विभाग के इस रवैये से साफ है कि अधिकारियों को अपने कर्मचारियों की जान की परवाह नहीं है। वहीं, विभाग अभी भी कर्मचारियों की इस मांग पर विचार ही कर रहा है। वन मंत्री ठाकुर सिंह भरमौरी कहते हैं कि जरूरत के हिसाब से कर्मचारियों की हर मांग को पूरा करने का प्रयास किया जा रहा है।
एचपी फॉरेस्टर्स एसोसिएशन के प्रधान तुलसीराम शर्मा ने कहा कि गश्त पैदल की जा सकती है, लेकिन बिना संसाधन के जंगल में जाना मौत के मुंह में जाने जैसा है।
मांग की कि कम से कम रेंज स्तर पर एक गाड़ी होनी चाहिए, ताकि इमरजेंसी की स्थिति में कर्मचारी तक पहुंचा जा सके और बिना समय गंवाए नजदीकी स्वास्थ्य केंद्र तक पहुंचाया जा सके। इसके अलावा टॉर्च और असलाह भी मुहैया कराया जाना चाहिए।