बागवानी विश्वविद्यालय नौणी के मृदा विज्ञान एवं जल प्रबंधन विभाग के प्रोफेसर डा. जेसी शर्मा का कहना है कि लोगों में यूरिया के बारे में कई भ्रांतियां हैं, इसलिए वे इसके इस्तेमाल से कतरा रहे हैं। सही मात्रा में इस सस्ती खाद को अपनाया जाए तो ये कम मात्रा में ज्यादा नाइट्रोजन की पूर्ति करती है।
कुल्लू और रोहडू् में बगीचों में किए शोध में ये तथ्य सामने आए हैं कि कैल्शियम नाइट्रेट खाद कैन का मुकाबला नहीं कर पा रही। महंगी होने के कारण जो किसान-बागवान कैल्शियम नाइट्रेट की ज्यादा मात्रा का इस्तेमाल नहीं करते हैं, उनकी जमीन की उपजाऊ क्षमता घट रही है, इसलिए कैल्शियम नाइट्रेट के बजाय यूरिया का सही तरीके से इस्तेमाल करना कम खर्चीला और बेहतर हो सकता है।
कैन खाद में 25 फीसदी तक नाइट्रोजन होती थी और ये अमोनिकल और नाइट्रेट दोनों ही फॉर्म में 12.50-12.50 फीसदी करके जमीन में मिलकर पौधों को मिलती रही है। कैल्शियम नाइट्रेट महज नाइट्रेट रूप में ही पौधों को 15.5 प्रतिशत नाइट्रोजन दे रही है।
प्रदेश की जमीन में वैसे भी नाइट्रोजन की मात्रा निम्न या मध्य श्रेणी में ही रहती है जबकि ये मध्य या उच्च श्रेणी में ही जमीन को मिलनी चाहिए जिससे पौधों का ठीक से विकास हो सकता है।
वर्ष 2008 के 26/11 मुंबई आतंकी हमले और इससे पहले वाराणसी, मालेगांव, दिल्ली आदि में हुए विस्फोटों समेत कई अन्य उग्रवादी घटनाओं के बाद केंद्र सरकार ने साल 2011 में अमोनियम नाइट्रेट की खुली बिक्री पर रोक लगा दी थी।
ये प्रतिबंध एक्सप्लोसिव्स एक्ट 1884 के तहत किए गए प्रावधानों के अनुसार लगाया गया। हालांकि, सरकार ने यह प्रावधान जरूर किया कि जिन खादों में इसका 45 फीसदी से कम इस्तेमाल हो रहा है, उनकी बिक्री पर रोक नहीं रहेगी।
लेकिन इनके इस्तेमाल पर कई तरह की पाबंदियां लगाई गईं। इससे बहुत सारी कंपनियों ने कैल्शियम अमोनियम नाइट्रेट (कैन) खाद बनाना बंद कर दी।