16वीं निर्वासित तिब्बत सरकार के प्रधानमंत्री पद सहित मंत्रिमंडल के लिए रविवार को दुनिया भर में अंतिम चरण का मतदान हुआ। तिब्बत की निर्वासित सरकार के मुख्यालय धर्मशाला सहित भारत के अन्य हिस्सों के अलावा करीब 30 देशों में रह रहे निर्वासित तिब्बती मतदाताओं ने नई सरकार चुनने के लिए लोकतंत्र के महापर्व में मतदान किया।
लेकिन वोटर होने के बावजूद इस बार भी धर्मगुरु दलाईलामा ने नई तिब्बत सरकार चुनने के लिए वोट नहीं डाला। हालांकि, दलाईलामा के पीए तेंजिन टाकला इसे निजी कारण बता रहे हैं। 27 अप्रैल को निर्वासित तिब्बतियों को नए प्रधानमंत्री सहित 45
सदस्यीय मंत्रिमंडल मिलेगा। रविवार को मतदान के दौरान धर्मशाला और साथ लगते क्षेत्रों में 9 मतदान केंद्र बनाए गए थे। इससे पूर्व प्रथम चरण के चुनाव वर्ष 2015 अक्तूबर को चुनाव हुए थे। इसमें 47,105 मतदाताओं ने हिस्सा लिया था।
निर्वासन के 57 वर्षों के दौरान निर्वासित तिब्बती सरकार के लिए दूसरी बार लोकतांत्रिक तरीके से चुनाव हो रहा है। प्रधानमंत्री पद के लिए लोकतांत्रिक तरीके से चुनाव का यह सिलसिला वर्ष 2011 में धर्मगुरु दलाईलामा ने अपनी राजनीतिक शक्तियों का त्याग करने के बाद शरू किया था। इस बार निर्वतमान तिब्बतियन प्रधानमंत्री डा. लोबसांग सांग्ये और निर्वासित तिब्बती संसद के स्पीकर पेंपा सेरिंग मैदान में हैं।
पूर्व पीएम रिंपोछे नाराज, नहीं डाला वोट- निर्वासित तिब्बत सरकार के पूर्व प्रधानमंत्री प्रो सामदोंग रिंपोछे नई निर्वासित सरकार के लिए हो रहे चुनाव प्रचार को लेकर बेहद नाराज है। पूर्व प्रधान मंत्री इस कद्र नाराज है कि उन्होंने नई निर्वासित सरकार की मतदान प्रक्रिया से कन्नी काट ली। रिंपोछे ने रविवार को मतदान नही किया।
रिंपोछे ने बताया कि निर्वासित सरकार के चुनाव प्रचार में पाश्चात्य पद्ति को अपनाया जा रहा। ये चुनाव परम पावन दलाईलामा के सिद्वांतों के अनुरूप नहीं हो रहे। इसलिए उन्होंने हमें मताधिकार का प्रयोग नही किया। उन्होंने कहा कि पहले दो
राउंड के चुनाव को इसलिए अपनाया गया था ताकि कोई भी प्रत्याशी अपने लिए वोट नहीं मांगेगा। तिब्बती पहले राउंड में प्रत्याशी बनाएंगे उसके बाद फाइनल राउंड में चयन करेंगे। लेकिन इस चुनाव में ऐसा कुछ नहीं हो रहा है। इसलिए मताधिकार करने का क्या फायदा।