दंत कथा अनुसार किसी समय मिंधल गांव में घूंगती नामक एक विधवा बूढ़ी महिला रहती थीं। उसके सात पुत्र थे, वे सभी विवाहित थे। एक बार महिला खाना बनाने के लिए चूल्हे से राख निकालने लगीं तो वहां शिला उत्पन्न हुई। इस संबंध में परिवार को बताया और उस शिला को तोड़ने का प्रयास किया गया। लेकिन, वह नहीं टूटी। ये क्रम सप्ताह भर चलता रहा। एक रात घूंगती के स्वप्न में काली माता ने दर्शन देकर बताया कि जिस पिंड़ी को तोड़ने का प्रयास किया जा रहा है, वह मेरा रूप है। पाषाण पिंडी के रूप में यहां पर प्रकट होना है। यह सुनकर घूंगती खेतों की ओर भागीं, जहां उसके बेटे-बहू काम कर रहे थे। वृद्ध महिला ने उन्हें इस अलौकिक घटना की जानकारी दी। परिवार के लोगों ने बुजुर्ग महिला पर विश्वास करने की बजाय बुरा-भला कहा। सहमी महिला जब घर लौटी और चूल्हे से राख निकालने लगी।
तभी मां कालिका के क्रोध के कारण पिंडी विशालकाय स्वरूप धारण करते हुए चूल्हे और छत को तोड़ती हुई प्रकट हुईं। जिस कारण घूंगती को कंपन होने लगा। उसने कंपन रोकने के लिए गाल पर सुई से छेदन किया। जिसका प्रमाण आज भी मिंधल माता मंदिर में मौजूद है। फिर घूंगती की तंद्रा टूटी और वे अपने बेटे के पास खेत में पहुंचीं। वहां माता मिंधल प्रकट होकर बोलीं- तेरे बेटों ने मेरा अनादर किया है व तुमने मेरी शक्ति को नहीं पहचाना है। इसी क्षण वृद्ध महिला के बेटे-बहू व बैल पाषाण बन जाएं। कोई भी यहां पर दो बैल से खेत नहीं जोत पाएगा, आज से इस गांव में कोई चारपाई पर नहीं सो सकेगा और न ही ऊन कातने का काम करेगा, यह मेरा श्राप है।
ऐसा कहते ही बुजुर्ग महिला के बेटे और बहुएं सब शिलाओं में तबदील हो गए। जब गांववालों ने सारा दृश्य अपनी आंखों से देखा तो मिंधल माता से माफी मांगने लगे। लोगों ने कहा कि मां हम आपके नाम से यहां भव्य मंदिर बनाएंगे तथा हमें क्षमा कर करें। घूंगती के आग्रह से प्रसन्न होकर माता ने उसे भी उसी स्थल पर मूर्ति बनाकर स्थापित करवाया। आज भी मिंधल माता की मृर्ति के साथ बुजुर्ग महिला की प्रणाम की मुद्रा में मूर्ति इस मंदिर के गर्भ गृह में है। 15वीं शताब्दी में निर्मित इस त्रिभुजाकार मंदिर में शानदार लकड़ी की नक्काशी की गई है तथा बड़ी संख्या में घंटियां चढ़ाने का रिवाज भी है।