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रस्मों, कसमों में भी बंध जाता है हिमाचल का वोटर

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लोकसभा चुनाव आज के दौर में बेशक पैसे और पावर का खेल बन गया हो, लेकिन पहाड़ी राज्य हिमाचल के कुछ हिस्सों में आज भी मतदाता रस्मों और कसमों में बंधा हुआ है।
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यहां कई ऐसी प्रथाएं आज भी हैं, जिनसे यह तय किया जाता है कि चुनाव में वोट किसे डालना है? सिरमौर जिले के दुर्गम क्षेत्रों में लूण-लोटा प्रथा है।

इसमें नमक और लोटे में भरे पानी को हाथों में देकर कसम दिलाई जाती है कि वोट किसे देना है? कुछ अनिष्ट होने की आशंका से कोई इस से बाहर नहीं जाता। कांगड़ा के भी कुछ हिस्सों में इस प्रथा की खबरें आती रही हैं।

देवता भी बताते हैं किसे डालना है वोट

हिमाचल के मैदानी जिलों में पीपल के पेड़ के नीचे खड़ा कर कसम दिलाई जाती है। स्पीति घाटी में छनका प्रथा है। इसमें गांव के लोग व्यक्ति या संस्था से निर्धारित रकम लेकर बैठक बुलाते हैं और उसमें लिया गया फैसला सर्वमान्य होता है।

शिमला जिले के दूरदराज, किन्नौर और कुल्लू आदि में देवता के आगे पूछ डालकर पता किया जाता है कि इस बार किसे वोट दिया जाए? देवता जिसे कहते हैं उसी को वोट जाता है।

इन रस्मों की जड़ें भी इतनी गहरी हैं कि इसके खिलाफ कोई शिकायत तक नहीं करता। एक कारण यह भी है कि गांवों के भोले-भाले लोगों के लिए आज भी देव परंपरा ही अनुशासन की लकीर है।

विधायक महेश्‍वर ने भी मानी देव प्रथा

कुल्लू में भगवान रघुनाथ के मुख्य सेवक एवं विधायक महेश्वर सिंह कहते हैं कि कुल्लू घाटी में अब भी कई गांवों में लोग देवता के सामने ‘पूछ डालकर’ वोट देते हैं।

हमें आकर बताते भी हैं कि देवता ने किसे वोट देने को कहा है? शिमला और सिरमौर जिले के दूरदराज क्षेत्रों में भी ऐसी घटनाएं होती हैं।

महेश्वर कहते हैं कि देव परंपरा का सम्मान करने वाला व्यक्ति वोट के लिए इसका दुरुपयोग नहीं करता।

फिलहाल नेता चाहे जो भी कहे, प्रचार के दौरान कई पार्टियां इस तरह के हथकंडे अपनाती है ताकि जीत हासिल की जा सके।
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ईष्ट को परिवार से एक वोट

वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव में शिमला के कसुम्पटी में दो कोटी और जुन्गा रियासतों के राज परिवारों से प्रत्याशी उतर गए।

रियासत में रहने वाले कई परिवारों ने इस तर्क के साथ दोनों प्रत्याशियों को वोट दिए कि राजा को आज भी ईष्ट माना जाता है।

ईष्ट को परिवार से कम से कम एक वोट देने की प्रथा है, नहीं तो दोष लगेगा। इस सीट से चुनाव लड़े तीसरे दल ने इसकी शिकायत चुनाव आयोग से भी की थी।

उध्‍ार, मुख्य चुनाव अधिकारी नरेंद्र चौहान का कहना है कि धर्म या धार्मिक परंपराओं को वोट के लिए इस्तेमाल करना चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन है। देवता या संप्रदाय का डर दिखा कर वोट हासिल करना रिप्रेजेंटेशन ऑफ पीपल एक्ट के खिलाफ है।

निष्पक्ष चुनाव के लिए मतदाता को अपने दिमाग का इस्तेमाल करना चाहिए। ऐसे मामलों में शिकायत मिले तो ही कार्रवाई की जा सकती है।
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