अमर उजाला के हिंदी हैं हम अभियान की कड़ी में अमर उजाला कार्यालय धर्मशाला में हिंदी की दशा और दशा विषय पर वेबिनार आयोजित किया गया। अमर उजाला के संवाद मंच पर बुद्धिजीवी वर्ग ने बेबाकी से अपने सार्थक विचार रखे। साहित्यकारों और विचारकों ने अमर उजाला के इस कदम की सराहना करते हुए हिंदी भाषा की दशा और दिशा पर खुलकर विचार साझा किए।
अच्छा लेखक बनने के लिए पढ़ना जरूरी: चंद्ररेखा
जिला कांगड़ा की प्रख्यात साहित्यकार और कवयित्री चंद्ररेखा डढवाल ने कहा कि भाषा का संकट विचारों का संकट है। अगर व्यक्ति के पास विचार ही नहीं हैं, तो वैचारिकता में भी कमी आएगी। एक अच्छा लेखक बनने के लिए पढ़ाई बहुत जरूरी है। उन्होंने कहा कि मौजूदा समय में युवाओं का रुझान हिंदी साहित्य की ओर कम हो रहा है। बावजूद इसके हिंदी साहित्य देश ही नहीं, बल्कि प्रदेश में भी सुधरा है और हिंदी भाषा का साहित्य समृद्ध हुआ है।
भाषा विचारों की वाहिनी है: फुल्ल
कई प्रख्यात पुस्तकें और रचनाएं लिखने वाले वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. सुशील कुमार फुल्ल ने कहा कि भाषा विचारों की वाहिनी है और साहित्यकार समाज के उत्थान के लिए प्रतिबद्ध हैं। डॉ. सुशील कुमार फुल्ल का कहना है कि हिंदी भाषा को पहले के मुकाबले मुकाम तो मिल रहा है, लेकिन आज भी वह उस मुकाम तक नहीं पहुंची है, जहां पर उसे होना चाहिए। राष्ट्रीय भाषा होने के बावजूद लेखकों को मौका नहीं मिल रहा है। हिंदी का विकास हुआ है और भाषा के जरिए कई रोजगार भी मिले हैं। प्रदेश में हिंदी और विकसित हो सकती है अगर प्रदेश में प्रकाशक मिल जाएं।
स्कूूलों से ही बचाई जा सकती है हिंदी: बलदेव सिंह
कोरोना काल में सोशल मीडिया में गाने से देश भर में सुर्खियां बटोरने वाले पुलिस विभाग में डीएसपी के पद तैनात बलदेव सिंह ने कहा कि हिंदी की स्थिति में काफी हद तक सुधार हुआ है। अधिकांश राज्यों के लोग अब हिंदी को समझने और जानने लगे हैं। हिंदी अब लोगों की संपर्क भाषा के रूप में सुदृढ़ हो रही है। अगर हिंदी साहित्य को बचाना है तो हिंदी को हमें स्कूलों से ही पढ़ाना होगा और लोगों के अंग्रेजी की ओर हो रहे रुझान को कम करना होगा।
ऐसे कैसे बढ़ेगी हिंदी: गुलेरिया
कायाकल्प पालमपुर के प्रशासक एवं कवि-साहित्यकार आशुतोष गुलेरी ने कहा कि हमारे समाज में ऐसे भी लोग हैं जो घरों में अपने बच्चों से अंग्रेजी में बात करते हैं और बात हिंदी साहित्य को बढ़ावा देने की करते हैं। उन्होंने कहा कि हिंदी हमारी मातृ भाषा है और इसे राष्ट्र भाषा कहना बिलकुल गलत है। उन्होंने कहा कि हिंदी मेरा स्वाभिमान है। गुलेरिया ने कहा कि हर भाषा का अपना स्थान होता है। उन्होंने कहा कि आज हिंदी नहीं मर रही, बल्कि हमारा विवेक मर रहा है, जोकि हिंदी के उत्थान के लिए बाधक है।
भारत को हिंदी की वजह से मिल रही पहचान : डॉ. प्रीति सिंह
केंद्रीय विश्वविद्यालय धर्मशाला में सहायक प्राचार्य के रूप में तैनात डॉ. प्रीति सिंह का कहना है कि हिंदी की वजह से ही आज भारत को विदेशों में भी पहचान मिली है। कई ऐसे देश हैं, जहां पर हिंदी को दूसरी भाषा बनाया गया है। उन्होंने कहा कि 600 से 800 भाषाएं हैं, लेकिन वे समझ में नहीं आती हैं। लेकिन हिंदी ही एकमात्र ऐसी भाषा है, जिसे हर व्यक्ति समझता है और बोलता है। उन्होंने कहा कि हिंदी की दशा ठीक है और हमारे देश में हिंदी विकसित भी हुई है।
समाचार पत्रों ने हिंदी पर मजबूत की है पकड़: मलकीयत
धर्मशाला कॉलेज में हिंदी विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर मलकीयत सिंह का कहना है कि भारत की नींव में हिंदी का बहुत बड़ा योगदान है। मौजूदा समय में समाचार पत्रों ने हिंदी को और मजबूती प्रदान की है और हिंदी को विकसित करने में अहम रोल अदा किया है। लोग किताबों से ज्यादा समाचार पत्रों से हिंदी सीखते हैं। अब तो हॉलीवुड की कई फिल्में भी अंग्रेजी और हिंदी दो संस्करणों में रिलीज हो रही हैं। वहीं बड़े-बड़े चैनल भी हिंदी का प्रयोग कर रहे हैं।
नेटवर्क की तरह है हिंदी की स्थिति: वशिष्ठ
प्रसिद्ध साहित्यकार सुदर्शन वशिष्ठ का कहना है कि मौजूदा समय में हिंदी की स्थिति मोबाइल नेटवर्क की तरह है। कभी ठीक हो जाती है तो कभी कमजोर हो जाती है। हिंदी साहित्य को अगर सही मायने में उभारना है तो हिंदी दिवस पर ही कार्यक्रम करवाने की बजाय इसे मूल रूप से प्रयोग करना होगा। जब तक सरकारी कार्यालयों में हिंदी भाषा का पूर्ण रूप से प्रयोग नहीं होता, तब तक हम हिंदी को विकसित नहीं कर सकते। अगर सरकार में संकल्प होगा तो हिंदी साहित्य सहित हिंदी पढ़ने वाले लोगों में रुचि पैदा होगी। सख्ती करने से ही हिंदी को सुदृढ़ किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि अदालती कार्यों में आज दिन तक अंग्रेजी ही अपना वर्चस्व कायम किए हुए है। जब तक सरकारी कार्यालयों में हिंदी के विकल्प को समाप्त नहीं किया जाता, तब तक हिंदी का उत्थान होना संभव नहीं है।
बोर्ड-यूनिवर्सिटी में प्रदेश के साहित्यकारों को मिले स्थान: व्यथित
प्रसिद्ध साहित्यकार गौतम व्यथित का कहना है कि हिंदी की दशा में काफी सुधार हुआ है। हिंदी अब पाठन और श्रवण की भाषा बनी है। कई कार्यालयों में भी हिंदी का प्रयोग हो रहा है। भारत ही नहीं विदेशों में भी हिंदी का बोलबाला बढ़ा है। उन्होंने कहा कि अगर प्रदेश के साहित्य को उभारना है तो यहां के साहित्यकारों के साहित्य को स्कूल शिक्षा बोर्ड और विश्वविद्यालयों में पढ़ाना होगा, जिससे लोगों को हिंदी साहित्य को जानने का मौका मिलेगा। इसके अलावा साहित्यकारों पर शोध और अध्ययन होना चाहिए।