अकसर लोग धर्मराज के बारे में सुनते हैं। लेकिन, भरमौर में साक्षात धर्मराज विराजमान हैं। मान्यता है कि यहां उनकी कचहरी लगती है और जीव आत्माओं के कर्मोँ का पूरा हिसाब होता है। जी हां, बताया जाता है कि भरमौर क्षेत्र में स्थापित धर्म राज के इस मंदिर को विश्व में इकलौता होने का भी गौरव हासिल है।
मणिमहेश यात्रा में शामिल होने के लिए देश के कोने-कोने से आने वाले श्रद्धालु इस पवित्र मंदिर के दर्शन करते हैं। कई सिद्ध पुरुष इस बात का दावा भी कर चुके हैं कि उन्होंने धर्मराज की कचहरी में होने वाले सवाल-जवाब खुद सुने हैं। हालांकि इसके फिलहाल प्रत्यक्ष प्रमाण मौजूद नहीं हैं।
चौरासी परिसर में बने इस मंदिर के ठीक सामने चित्रगुप्त का आसन बनाया गया है। जबकि मंदिर से पहले सीढ़ियां और एक गुप्त यंत्र स्थापित है। बताया जाता है कि इसी गुप्त यंत्र से धर्मराज सबके जीवन का हिसाब लेते हैं। साथ ही मंदिर के बगल में ढाई सीढ़ियां लगी हैं जिन्हें स्वर्ग के दरवाजे के रूप में भी देखा जाता है।
इस तरह हुई मंदिर की खोज
भरमौर में चित्रगुप्त का आसन
ऐसा माना जाता है कि भरमौर में चौरासी मंदिर परिसर दसवीं शताब्दी से भी पहले का बना है। यहां अलग-अलग देवताओं की शरण स्थली है। चौरासी में धर्मराज मंदिर वाली जगह स्थापित टेढ़ा शिवलिंग था।
यहां महाराज कृष्ण गिरि ने 1950 के बाद अपना आसन लगाया था। बताया जाता है कि उस समय महात्मा के साथ मिलकर कुछ लोगों ने शिवलिंग का सीधा करने की कोशिश की। लेकिन अंतहीन खुदाई की वजह से उन्हें काम रोकना पड़ा।
क्या कहते हैं पुजारी
भरमौर में धर्मराज का मंदिर।
इसके बाद महाराज कृष्ण गिरि ने कई महीनों तक मंदिर के बाहर साधना की और उन्हें इस बात का आभास हुआ कि यहां धर्मराज की कचहरी लगती है। महाराज कृष्ण गिरि का 1962 में देहांत हो चुका है और उनकी समाधि धर्मराज मंदिर के साथ ही बनी है। धर्मराज मंदिर के पुजारी पंडित लक्ष्मण दत्त शर्मा का कहना है कि उनके पूर्वज मंदिर में पूजा-अर्चना करते आए हैं।
उन्होंने इस बात का खुलासा किया था कि मंदिर परिसर में कई बार ऐसी ध्वनियां सुनाई देती हैं जैसे कोर्ट में बहस हो रही हो। उन्होंने कहा कि चित्रगुप्त सभी के कर्मों का हिसाब रखते हैं और मृत्यु के बाद दूसरी दुनिया का मार्ग धर्मराज की सीढ़ियों से होकर ही जाता है।