दशहरे से दो सप्ताह पहले खराहल, ऊझी, बंजार, सैंज घाटी के देवता प्रस्थान करना शुरू कर देते हैं। कई देवता अपने देवलुओं-कारिंदों के साथ 200 किलोमीटर तक पैदल यात्रा के दौरान उफनती नदियों, जंगलों, पहाड़ों से होते हुए अठारह करड़ू की साेह कुल्लू के ढालपुर पहुंचते हैं।
देवता सदियाें पुराने अपने रास्त्ााें से आते हैं। उनके विश्राम करने, रुकने, पानी पीने तक के स्थान तय हैं। धूप, बारिश हर मौसम में उनका आगमन नहीं रुकता। देवताओं के कारकून व देवलु दशहरा के सात दिनों तक अस्थायी शिविरों में तपस्वियाें की तरह रहते हैं।
कारकून कड़े देव नियमों से बंधे होते हैं। न बाहर जा सकते और न दूसरों का बना खाना खा सकते हैं। एक जगह पर 250 देवी-देवताओं के दर्शनों के लिए रोजाना डेढ़ लाख लोग, देशी-विदेशी पर्यटक, शोधार्थी हाजिरी भरते हैं।