मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के खिलाफ लगे लांड्रिंग आरोपों के मामले पर चर्चा के लिए अड़ी भाजपा ने सदन में खूब हंगामा किया। सदन में आधे घंटे तक हंगामे के बाद प्रश्नकाल के बीच ही विपक्ष ने वाकआउट कर दिया।
सदन में सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों ओर से एक-दूसरे के खिलाफ जमकर नारेबाजी हुई। हंगामे के बाद करीब एक घंटे तक सदन की कार्यवाही बिना विपक्ष के ही चली। सोमवार को विधानसभा के मानसून सत्र के चौथे दिन भी सदन में गतिरोध बरकरार रहा।
दो दिन छुट्टी के बाद दोपहरबाद दो बजे जैसे ही सदन की कार्यवाही शुरू हुई विपक्ष ने हंगामा कर दिया। प्रश्नकाल शुरू होने से पहले स्पीकर बृज बिहारी बुटेल ने सदस्यों से अनुरोध किया कि वे सदन को शांतिपूर्वक चलने दें। न्यायालयों में चल रहे मामलों को सदन में न लाया जाए।
इसी बीच भाजपा विधायक दल के मुख्य सचेतक सुरेश भारद्वाज खड़े हो गए। उन्होंने कहा कि भाजपा विधायक अध्यक्ष का पूरा सम्मान करते हैं, मगर जो नोटिस नियम 67 के तहत चर्चा को दिया गया, उसे क्यों नहीं माना। इस मामले को अर्द्धन्यायिक कहा गया लेकिन इसी पर मुख्यमंत्री को बोलने की अनुमति दी गई।
जब मुख्यमंत्री इस पर बोल सकते हैं तो चर्चा क्यों नहीं हो सकती? इस पर स्पीकर ने कहा कि सीएम के बयान में सब जुडिस जैसा कुछ नहीं है। इस बीच नेता प्रतिपक्ष प्रेमकुमार धूमल ने कहा - जिस मुद्दे पर चर्चा को नोटिस था, उसी पर यह स्टेटमेंट थी।
प्रेस में जो बातें आ रही हैं, वे सब जुडिस नहीं होतीं। हम ऐसी ही बातों पर चर्चा को कह रहे हैं। विपक्ष ने इस बीच नारेबाजी शुरू कर दी। दूसरी ओर सत्ता पक्ष भी खड़ा होकर नारेबाजी करने लगा। इसी बीच, प्रश्नकाल शुरू हुआ। करीब आधा घंटा हंगामे के बाद ढाई बजे विपक्ष के सदस्यों ने सदन से वाकआउट कर दिया। सदन की कार्यवाही बिना विपक्ष के ही चलती रही।
मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह ने कहा कि सदन में जिस तरह की बातें विपक्ष ने की हैं, वो हम भी कर सकते हैं। समय आने पर ऐसे मामले उठाए जाएंगे। हम अगर चुप हैं तो इसका मतलब यह नहीं कि हमारे पास बोलने को कुछ नहीं है। धूमल और अनुराग पर कोर्ट में मामले चल रहे हैं। ये मामले क्रिकेट के नाम पर प्रदेश की संपत्ति बेचने के हैं।
नेता प्रतिपक्ष प्रेम कुमार धूमल ने कहा कि भ्रष्टाचार एक बड़ा मुद्दा है। एचपीसीए से लेकर मेरे ऊपर लगे भ्रष्टाचार के हर आरोप पर मैं सदन में चर्चा कराने के लिए तैयार हूं, लेकिन साथ ही मनी लांड्रिंग मामले की भी चर्चा हो। इसका प्रस्ताव सत्ता पक्ष से आना चाहिए। तभी तो दूध का दूध और पानी का पानी होगा।