प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मुलाकात के बाद तिब्बती धर्मगुरु दलाईलामा ने बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा कि भारत और चीन में अच्छे रिश्ते होना बहुत जरूरी है। दोनों देशों की सभ्यताएं बहुत पुरानी हैं और आर्थिक तौर पर भी दोनों देश बड़ी शक्तियां हैं। रविवार को चंडीगढ़ जाते हुए कुछ देर के लिए ऊना सर्किट हाउस में रुके धर्मगुरु ने पत्रकारों से अनौपचारिक बातचीत में कहा कि वर्ष 1974 में हमने तय किया था कि चीन से आजादी की मांग नहीं की जाएगी।
चीन में रहते हुए तिब्बती सिर्फ अपनी संस्कृति के संरक्षण के लिए कुछ अधिकारों की मांग कर रहे हैं। दलाईलामा ने कहा कि हम तिब्बती नालंदा दर्शन का अनुसरण कर रहे हैं और नालंदा दर्शन तर्क पर आधारित है। आज चीन के कुछ बुद्धिजीवी भी मानते हैं कि तिब्बती बौद्ध धर्म पौराणिक नालंदा परंपरा के अनुसार है जो पूरी तरह से विज्ञान पर आधारित है। इन बौद्ध शिक्षाओं को आधुनिक शिक्षा के साथ पढ़ाया जा सकता है।
उन्होंने कहा कि एक ओर तिब्बती भारत में शरणार्थी के रूप में रह रहे हैं तो वहीं 60 वर्षों में हमने भारत की आजादी का आनंद लिया है। उन्होंने कहा कि वर्ष 2001 में उन्होंने राजनीतिक फैसलों से स्वयं को अलग कर लिया था और भारत में रहने वाले मुट्ठी भर तिब्बती शरणार्थियों ने लोकतांत्रिक व्यवस्था को अपनाया है। आज तिब्बतियों की चुनी हुई सरकार सभी जिम्मेदारियों का निर्वहन कर रही है। ऊना पहुंचने पर उपायुक्त संदीप कुमार ने धर्मगुरु दलाईलामा की अगवानी की।