मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने कहा कि सीएसआईआर को 1966 के अवार्ड के तहत 6 सप्ताह के भीतर कब्जा लेना चाहिए था। खंडपीठ ने कहा कि चूंकि प्रतिवादी 1966 से ही उस जमीन पर बिना किसी रोकटोक के रह रहे हैं और वहां निर्माण भी कर चुके हैं, इसलिए उन्होंने प्रतिकूल कब्जे के आधार पर अपना मालिकाना हक पुख्ता कर लिया है। कोर्ट ने कलेक्टर के उस फैसले को सही ठहराया, जिसमें कहा गया था कि 23 वर्षों की देरी के बाद कब्जे के लिए आवेदन करना कानूनन सही नहीं है। 8 जुलाई 1966 को भूमि अधिग्रहण का अवार्ड सुनाया गया।
सीएसआईआर ने मुआवजा तो जमा कर दिया, लेकिन जमीन का कब्जा लेने के लिए 30 साल तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया। 23 साल बीत जाने के बाद 1989 में पहली बार सीएसआईआर ने कब्जे के लिए दीवानी मुकदमा दायर किया था। कलेक्टर ने प्रतिकूल दावे के आधार पर मामला खारिज कर दिया था। उसके बाद एकल न्यायाधीश ने 2013 के नए भूमि अधिग्रहण कानून की धारा 24(2) के तहत इस अधिग्रहण को रद्द मान लिया था। हालांकि, खंडपीठ ने इसे दुरुस्त करते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट के इंदौर डेवलपमेंट अथॉरिटी के फैसले के बाद अब सिर्फ कब्जा नहीं लेने के आधार पर अधिग्रहण रद्द नहीं होता, यदि मुआवजा दिया जा चुका हो, लेकिन यहां प्रतिकूल कब्जे का सिद्धांत लागू हो गया।