हिमाचल प्रदेश के ऊना की फर्म को केसीसी बैंक से 19.50 करोड़ का लोन मंजूर करने के मामले में दर्ज विजिलेंस केस की जांच आगे बढ़ने के साथ ही बैंक प्रबंधन की ओर से किए गए खेल की पोल खुलती जा रही है। जांच में पता चला है कि जिस यूआर सिंटर प्राइवेट लिमिटेड फर्म को नियमों को दरकिनार कर लोन दिया गया, उस फर्म की ओर से लोन के एवज में गिरवी रखी गई संपत्तियों के मूल्यांकन में भी खेल हुआ था। मूल्यांकन करने के लिए इंपैनल वैल्युअर राजिंद्र धीमान और नरेंद्र पॉल सैनी ने फर्म के निदेशकों अनिमेष उप्पल, शिवम सेठ, चेतन नेगी और प्रदीप जम्वाल को लाभ पहुंचाने के लिए गिरवी संपत्तियों की ज्यादा वैल्यू लगा दी।
खास बात यह है कि बैंक के एक अधिकारी ने प्रबंधन को लिखित में अवगत करा दिया था कि जिन संपत्तियों को कंपनी ने गिरवी रखने के लिए दिखाया है उन्हें तीन महीने पहले ही सिर्फ 2.29 करोड़ की कीमत पर खरीदा गया है। जबकि कंपनी ने इनकी कीमत 21.3 करोड़ और डिस्ट्रेस वैल्यू 16.72 करोड़ दर्शाई। अक्तूबर 2014 में अधिकारी ने प्रबंधन को राज्य के अंदर मौजूद कंपनी अतिरिक्त संपत्तियों को गिरवी पर लेने के लिए कहा था। इसके अलावा यह भी कहा कि जिन जमीनों को गिरवी रखने के लिए दिया जा रहा है उनकी चौहद्दी न होने से भविष्य में दिक्कत हो सकती है, साथ ही कहा कि कंपनी का नया सिबिल स्कोर व नैबकॉन एजेंसी से नई वायबिलिटी रिपोर्ट के अलावा गारंटरों की नेटवर्थ की सारी जानकारियों के बावजूद लोन कमेटी के सदस्यों करनैल सिंह राणा, लेख राज कंवर, प्रकाश चंद राणा और योग राज के अलावा तत्कालीन एमडी राखिल काहलो ने फर्म का लोन मंजूर कर दिया।