हिमाचल प्रदेश क्रिकेट एसोसिएशन केस में अफसरों की मुश्किलें खत्म होने का नाम नहीं ले रहीं। अब इनके खिलाफ फिर से जांच खुलने जा रही है।
जानकारी के अनुसार भाजपा सरकार के समय धर्मशाला में हुए आईपीएल मैचों को मुफ्त पुलिस सुरक्षा दी गई थी। ये फैसला कुछेक अफसरों ने लिया था।
आरटीआई कार्यकर्ता की शिकायत पर मुख्यमंत्री कार्यालय ने इस केस की फाइल दोबारा खुलवा दी है। कार्यवाहक मुख्य सचिव ने वित्त विभाग को फाइल भेजकर पूछा है कि क्या इस बारे में पहले कोई राय मांगी गई थी?
पुलिस प्रबंधों पर खर्च हुए थे 2.37 करोड़
इस केस का रिकार्ड बताता है कि धर्मशाला में वर्ष 2010 और 2011 में हुए आईपीएल मैचों में कुल 2.37 करोड़ पुलिस प्रबंधों पर खर्च हुए।
इसकी वसूली एचपीसीए से करने को लेकर 2012 में ही धर्मशाला के विनय शर्मा ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। गृह विभाग ने जवाब दिया कि सरकार ये धनराशि नहीं लेगी, क्योंकि आईपीएल मैचों से पर्यटन और अर्थव्यवस्था को मजबूती मिली है।
पड़ताल में खुलासा हुआ है कि पूर्व गृह सचिव पीसी धीमान ने तत्कालीन डीजीपी डा. डीएस मन्हास की रिपोर्ट के आधार पर खुद ही ये फैसला ले लिया।
पूर्व डीजी मन्हास ने दी थी राय
19 अप्रैल 2012 को धीमान ने फाइल पर लिखा कि वह डीजीपी डीएस मन्हास की राय का समर्थन करते हैं। 20 अप्रैल 2012 को तत्कालीन मुख्य सचिव ने भी इसे अप्रूव कर दिया।
हरिंद्र हीरा एक महीने के लिए मुख्य सचिव बनी थीं। अब इस प्रक्रिया में शामिल रहे सभी अफसर जांच के दायरे में आ गए हैं। वित्त विभाग के जवाब के आधार पर इनसे जवाब तलब होगा।
सरकारी खजाने को हुए नुकसान को आधार बनाया जा सकता है। एचपीसीए को भी 2.37 करोड़ की वसूली के लिए रिकवरी नोटिस जारी हो सकता है।
किंग्स से लिया पैसा, दूसरों से क्यों नहीं
तर्क है कि जब 2013 का खर्च किंग्स इलेवन ने दिया है तो पहले का क्यों नहीं? इस सबकी जांच की जाएगी।
एचपीसीए प्रवक्ता मोहित सूद का कहा है कि आईपीएल के पुलिस सुरक्षा खर्च से एचपीसीए का कोई लेना-देना नहीं है।
बीसीसीआई और आईपीएल के बीच हुए एग्रीमेंट के अनुसार ये फ्रैंचाइजी को चुकाना है। धर्मशाला में कारोबार और पर्यटन को आईपीएल से फायदा होता है, ये सब जानते हैं।