शिकायतकर्ता ने खुली नीलामी में खरीदी थी गाड़ी, कंपनी की ओर से नहीं दी गई थी एनओसी
शिकायतकर्ता के नाम नहीं हो सकी पंजीकृत
रुचि सांख्यान
शिमला। हिमाचल प्रदेश राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग शिमला ने सार्वजनिक नीलामी में कोर्ट से सुपुर्दारी पर छूटी विवादित कार बेचने के मामले में श्रीराम ऑटोमॉल को कड़ी फटकार लगाई है। राज्य उपभोक्ता आयोग के अध्यक्ष न्यायमूर्ति इंदर सिंह मेहता और सदस्य प्रताप सिंह ठाकुर की खंडपीठ ने श्रीराम ऑटोमॉल की अपील को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए आदेश दिया है कि कंपनी 45 दिनों के भीतर खरीदार को वाहन के सभी आवश्यक दस्तावेज, एनओसी उपलब्ध कराए और 50,000 रुपये का मुआवजा अदा करे। यदि कंपनी तय सीमा में दस्तावेज देने में विफल रहती है तो उसे 3,26,634 रुपये की पूरी राशि, 50,000 रुपये मुआवजा और 15,000 रुपये मुकदमा खर्च के रूप में चुकाने होंगे। निर्धारित अवधि के बाद भुगतान करने पर नौ प्रतिशत वार्षिक की दर से ब्याज भी देना होगा।
कांगड़ा निवासी रुद्र कुमार ने अक्तूबर 2022 में बिलासपुर क्षेत्र स्थित श्रीराम ऑटोमॉल के यार्ड से खुली निलामी में एक टाटा टियागो कार 2,35,000 रुपये में खरीदी थी। इसके साथ ही उन्होंने 5,544 रुपये कमीशन शुल्क और लगभग 82,000 रुपये वाहन के नवीनीकरण पर खर्च किए थे।
खरीद के समय आश्वासन दिया गया था कि वाहन के मालिकाना हक हस्तांतरण से जुड़े सभी जरूरी कागजात उपलब्ध कराए जाएंगे। हालांकि, बाद में सामने आया कि यह कार मंडी अदालत से सुपुर्दारी पर छूटी हुई थी और इसके मालिकाना हक पर कानूनी रोक थी। कंपनी की ओर से न तो एनओसी दी गई और न ही सेल एफिडेविट जिसके कारण गाड़ी शिकायतकर्ता के नाम पर पंजीकृत नहीं हो सकी।
परेशान होकर उपभोक्ता ने जिला उपभोक्ता आयोग कांगड़ा स्थित धर्मशाला में शिकायत दर्ज करवाई थी। जिला आयोग ने शिकायत स्वीकार करते हुए श्रीराम ऑटोमॉल को 3,26,634 रुपये नौ प्रतिशत ब्याज सहित लौटाने, 60,000 रुपये मानसिक प्रताड़ना का मुआवजा और 15,000 रुपये मुकदमा खर्च देने का आदेश दिया था। इस आदेश के खिलाफ कंपनी ने राज्य उपभोक्ता आयोग में अपील दायर की थी।
राज्य उपभोक्ता आयोग ने कंपनी के उस तर्क को खारिज कर दिया जिसमें उसने खुद को सिर्फ एक मध्यस्थ बताया था और दावा किया था कि गाड़ी जैसी है जहां है की शर्त पर बेची गई थी। आयोग ने स्पष्ट किया कि उपभोक्ता संरक्षण कानून के तहत नीलामी में वाहन खरीदने वाला व्यक्ति भी उपभोक्ता की श्रेणी में आता है और विक्रेता का यह दायित्व है कि बेची जाने वाली संपत्ति कानूनी अड़चनों से मुक्त हो।
आयोग ने आदेश दिया कि कंपनी 45 दिनों के भीतर वाहन के रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट से लोन देनदारी हटवाए, सेल एफिडेविट दे, संबंधित कोर्ट से एनओसी लाकर दे और शिकायतकर्ता को 50,000 रुपये का मुआवजा दे।