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Shimla News: चेक बाउंस मामले में दोषी को डेढ़ साल की कैद और 16 लाख जुर्माना

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2016 में जमीन की खरीद-फरोख्त के लिए दोषी ने दिया था 10 लाख रुपये का चेक
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संवाद न्यूज एजेंसी
शिमला। अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट कोर्ट नंबर-1 शिमला प्रतिभा नेगी की अदालत ने नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट से जुड़े मामले में आरोपी जितेंद्र वर्मा को दोषी करार दिया है। अदालत ने आरोपी को डेढ़ वर्ष की साधारण कैद और 16,00,000 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई है।
मल्याणा निवासी शिकायतकर्ता आशुतोष ने अदालत में पक्ष रखते हुए बताया कि भट्ठाकुफर निवासी जितेंद्र वर्मा के साथ 14 दिसंबर 2016 को जमीन की खरीद-फरोख्त का एक इकरारनामा हुआ था। तय समय के भीतर सेल डीड पंजीकृत न कराने पर दोषी ने कानूनी बकाया के तहत 10 लाख रुपये का चेक शिकायतकर्ता के पक्ष में जारी किया था। इस चेक को जब बैंक में लगाया गया तो खाते में पर्याप्त राशि न होने के कारण 25 जुलाई 2017 को बाउंस हो गया। इसके बाद कानूनी नोटिस भेजने और तय समय सीमा में भुगतान न होने पर अदालत में धारा 138 एनआई एक्ट के तहत मुकदमा दायर किया गया।
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दूसरी ओर, बचाव पक्ष ने अदालत में दलील दी कि आरोपी के खिलाफ झूठा मामला दर्ज किया गया है और कोई भी वैध ऋण या देयता अस्तित्व में नहीं थी। बचाव पक्ष ने मुख्य रूप से यह तर्क रखा कि चेक केवल एक सुरक्षा (सिक्योरिटी) के तौर पर दिया गया था जिसका शिकायतकर्ता द्वारा दुरुपयोग किया गया है। दोषी ने दलील दी कि शिकायतकर्ता ने समझौते की शर्तों का खुद उल्लंघन किया था और ठियोग अदालत में दायर स्पेसिफिक परफॉर्मेंस का मुकदमा अदालत से खारिज हो चुका है। बचाव पक्ष ने यह भी आपत्ति उठाई थी कि दोषी को शिकायतकर्ता द्वारा भेजा गया कानूनी नोटिस कभी प्राप्त ही नहीं हुआ था।
अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने और रिकॉर्ड का बारीकी से अध्ययन करने के बाद पाया कि सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसलों के अनुसार एक बार चेक पर हस्ताक्षर स्वीकृत होने के बाद वैधानिक धारणा आरोपी के खिलाफ एक्टिव हो जाती है। दोषी यह साबित करने में विफल रहा कि चेक केवल सुरक्षा के लिए था या उसने नोटिस प्राप्त नहीं किया था क्योंकि कोर्ट सम्मन भी उसी पते पर तामील हुए थे।
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अदालत ने सुनवाई के दौरान पक्षकारों के बीच मुकदमे के दौरान दो लाख रुपये के भुगतान पर भी गौर किया। इसके बाद अपराध की प्रकृति और गंभीरता को देखते हुए सर्वोच्च न्यायालय के सिद्धांतों का हवाला देते हुए प्रोबेशन अधिनियम का लाभ देने से इन्कार कर दिया।
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