जंगली जानवर को बचाते गाड़ी हुई थी क्षतिग्रस्त
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शिमला। जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग शिमला ने वाहन दुर्घटना क्लेम का निपटारा न करने के मामले में रिलायंस जनरल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड को कड़ी फटकार लगाई है। आयोग के अध्यक्ष डॉ. बलदेव सिंह और सदस्य निधि शर्मा की पीठ ने बीमा कंपनी को आदेश दिया है कि शिकायतकर्ता को वाहन के बीमित घोषित मूल्य (आईडीवी) से 1,000 रुपये कटौती (एक्सेस क्लॉज) के बाद शेष 2,23,643 रुपये 9 प्रतिशत वार्षिक ब्याज सहित अदा करे। इसके साथ ही सेवा में कोताही के चलते मानसिक परेशानी के लिए 25,000 रुपये मुआवजा और 15,000 रुपये मुकदमा खर्च के रूप में 45 दिनों के भीतर भुगतान करने के निर्देश दिए हैं। मामले में शामिल गोयल मोर्ट्स के खिलाफ दायर शिकायत को आयोग ने खारिज कर दिया।
टूटीकंडी निवासी शिकायतकर्ता अनिल शर्मा के अनुसार उन्होंने अपनी कार का रिलायंस जनरल इंश्योरेंस से 2,24,643 रुपये आईडीवी पर पैकेज बीमा करवाया था। 28 अक्तूबर 2024 की रात करीब 11 बजे गुम्मा मार्केट के पास अचानक एक जंगली जानवर के सामने आ जाने से उसे बचाने के प्रयास में चालक चिराग शर्मा ने गाड़ी दार्यी ओर मोड़कर ब्रेक लगाए जिससे कार फिसलकर सड़क किनारे पलट गई। हादसे में वाहन पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया। पुलिस थाना गुम्मा में सूचना दर्ज करवाने के बाद चालक के रक्त के नमूने जांच के लिए राज्य फॉरेंसिक विज्ञान प्रयोगशाला (एसएफएसएल) जुन्गा भेजे गए जिसमें अल्कोहल का कोई अंश नहीं पाया गया।
शिकायतकर्ता ने सभी जरूरी दस्तावेज सौंप दिए थे, लेकिन बीमा कंपनी चालक की एमएलसी और एफएसएल रिपोर्ट का बहाना बनाकर मामले को लटकाती रही। कंपनी के सर्वेयर ने मरम्मत के आधार पर सिर्फ 1,10,265 रुपये की देनदारी तय की थी। वहीं, मेकेनिक अजय कुमार (मैसर्स गौतम ऑटो जोन, दारलाघाट) की ओर से तैयार एस्टीमेट के अनुसार मरम्मत का खर्च 1,98,275 रुपये आंका गया जो आईडीवी के 75 फीसदी से अधिक होने के कारण टोटल लॉस का मामला बनता था।
आयोग ने सुप्रीम कोर्ट के न्यू इंडिया एश्योरेंस बनाम प्रदीप कुमार मामले का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि सर्वेयर की रिपोर्ट महत्वपूर्ण साक्ष्य जरूर है, लेकिन यह अंतिम और बाध्यकारी नहीं है। आयोग ने पाया कि शिकायतकर्ता की ओर से पेश किए गए रिपेयर एस्टीमेट पर बीमा कंपनी ने कोई ठोस आपत्ति या जिरह नहीं की थी। पीठ ने कहा कि यदि कंपनी को शराब पीने का संदेह था तो उसके साक्ष्य जुटाना कंपनी की जिम्मेदारी थी, न कि इसके नाम पर क्लेम को अटकाए रखना। आयोग ने बीमा कंपनी को आदेश दिया कि वह साल्वेज (कबाड़) और रद्दीकरण आरसी प्राप्त कर 45 दिनों में निर्धारित राशि का भुगतान सुनिश्चित करे।