हिमाचल के धर्मशाला में सिद्धबाड़ी में एक घर से अंग्रेजों के जमाने की 100 वर्ष पुरानी चोरी हुई अष्टधातु की बहुमूल्य लक्ष्मी माता की मूर्ति एचआरटीसी की बस की डिक्की से बरामद की गई है। हालांकि, लक्ष्मी माता की मूर्ति का पीछे का चक्र अभी नहीं मिला है। 30 किलो वजनी अष्टधातु की मूर्ति मैकलोडगंज से दिल्ली चलने वाली बस में मिली है। जिस बैग से मूर्ति मिली है, इसमें कुछ कपड़े भी मिले हैं।
मैकलोडगंज से दिल्ली गई बस जब वापस धर्मशाला पहुंची तो डिक्की में परिचालक ने एक बैग लावारिस पड़ा देखा। उसने बैग उठाया तो भारी था। इसे खोला तो इसमें बड़ी मूर्ति थी। इस पर उसने आरएम धर्मशाला को सूचित किया। इसके बाद पुलिस को सूचित किया गया। अब सवाल उठ रहा है कि क्या चोर अष्टधातु की मूर्ति को दिल्ली से बाहर ले जाने की फिराक में थे।
क्या मूर्ति तस्कर एचआरटीसी की बस में ही बैठा था या उसने धर्मशाला से मूर्ति को डिक्की में रखकर अपने साथी को दिल्ली में सूचित कर दिया था। इन सभी पहलुओं को खंगालने के लिए पुलिस जांच में जुट गई है। बस में किन किन यात्रियों ने सफर किया, पुलिस इसकी भी जांच करने में जुट गई है। एएसपी विजय सकलानी ने कहा कि सिद्धपुर के एक मंदिर से चोरी हुई लक्ष्मी माता की मूर्ति को निगम की बस की डिक्की से बरामद किया गया है। उन्होंने कहा कि मामले में जांच चल रही है। आरोपियों की तलाश की जा रही है।
नौ दिसंबर को चली थी बस
अरुणा शर्मा निवासी सिद्धबाड़ी ने 7 दिसंबर रात को पुलिस चौकी योल में बहुमूल्य मूर्ति के चोरी होने की रपट लिखवाई थी। इसके बाद 10 दिसंबर को लक्ष्मी माता की मूर्ति बस से मिली है। बस आठ दिसंबर की रात को मैकलोडगंज से दिल्ली चली थी। इसी बस में माता लक्ष्मी की मूर्ति दिल्ली ले जाई गई। बस नौ दिसंबर की रात को दिल्ली से मैकलोडगंज के लिए चली। 10 दिसंबर की सुबह बस की डिक्की से लक्ष्मी माता की मूर्ति बरामद हुई।
सात को चोरी हुई मूर्ति
अरविंद शर्मा ने बताया था कि चोरी रात सात दिसंबर को 1 और 2 बजे के करीब हुई थी। उनके पिता शंभूनाथ 2 बजे घर के आंगन में बने शौचालय में जाने के लिए बाहर आए तो मंदिर का दरवाजा खुला देखा। अंदर देखा तो मूर्ति गायब थी। उन्होंने बताया कि मंदिर में चांदी के बर्तन तथा अन्य और भी वस्तुएं रखी हुई थीं लेकिन चोरों ने मूर्ति को ही चोरी किया था। उन्होंने बताया कि मूर्ति के ऊपर लगाए गए 2 छत्र, एक पायल तथा हार रास्ते में पड़े मिले।
आजादी से पहले गोरखा रेजीमेंट करती थी मूर्ति की पूजा
यह प्राचीन कीमती मूर्ति अरविंद के नाना गजाधर शर्मा द्वारा उनके घर में लगभग 20 वर्ष पूर्व स्थापित करवाई गई थी। इससे पूर्व यह मूर्ति आजादी से पूर्व धर्मशाला केंट में उस समय गोरखा राइफल जीआर के एक ट्रेनिंग कैंप में स्थापित की गई थी। कैंप के यहां से शिफ्ट होने से अंग्रेज अधिकारियों ने यह मूर्ति गजाधर शर्मा को देखभाल के लिए सौंपी थी।