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Climate Change: सदी के अंत तक 2.8 डिग्री बढ़ सकता है तापमान, सर्दियों की बारिश में 90% तक कमी का अनुमान

Mon, 10 Aug 2026 10:15 AM IST
Ankesh Dogra अमर उजाला ब्यूरो, शिमला।

सार

जलवायु परिवर्तन हिमालयी नदियों और जलविद्युत परियोजनाओं के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है। एक अध्ययन के अनुसार सदी के अंत तक तापमान 2.8 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ने का अनुमान है। मानसून में बारिश 40 फीसदी तक बढ़ सकती है, जबकि सर्दियों की बारिश 90 फीसदी तक घट सकती है। सूखे मौसम में नदियों का औसत बहाव करीब 80 फीसदी तक कम होने की आशंका है। इसका असर जलविद्युत उत्पादन और पानी की उपलब्धता पर पड़ सकता है।
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जलवायु परिवर्तन। - फोटो : अमर उजाला नेटवर्क
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विस्तार
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जलवायु परिवर्तन का असर आने वाले दशकों में हिमालयी नदियों के प्रवाह और उन पर निर्भर जलविद्युत परियोजनाओं पर दिखाई दे सकता है। एक अध्ययन में अनुमान लगाया गया है कि सदी के अंत तक तापमान में करीब 2.8 डिग्री सेल्सियस तक वृद्धि हो सकती है। इसके साथ ही बारिश के मौसमी वितरण में भी बड़ा बदलाव आने की संभावना जताई गई है।

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अध्ययन के मुताबिक मानसून के दौरान बारिश में करीब 40 फीसदी तक बढ़ोतरी हो सकती है, जबकि सर्दियों में होने वाली बारिश में 90 फीसदी तक कमी आने का अनुमान है। इसका सीधा असर नदियों में पूरे वर्ष पानी की उपलब्धता और उनके मौसमी प्रवाह पर पड़ सकता है।

सबसे अधिक चिंता सूखे मौसम को लेकर जताई गई है। इस दौरान नदियों का औसत बहाव करीब 80 फीसदी तक कम होने की आशंका है। हिमाचल, उत्तराखंड, जम्मू-कश्मीर और लद्दाख जैसे हिमालयी क्षेत्रों में बड़ी संख्या में जलविद्युत परियोजनाएं नदी के प्राकृतिक प्रवाह पर निर्भर हैं। ऐसे में पानी के प्रवाह में बदलाव का असर बिजली उत्पादन पर भी पड़ सकता है।
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यह अध्ययन अरुणाचल प्रदेश की कामेंग हाइड्रो इलेक्ट्रिक परियोजना को आधार बनाकर किया गया है। इसमें भविष्य में नदी के जल प्रवाह और उससे होने वाले बिजली उत्पादन में संभावित बदलावों का आकलन किया गया है। अध्ययन के लेखक सिद्धार्थ अरोड़ा, अनिल वी. कुलकर्णी और प्रोसेनजीत घोष हैं। अरोड़ा और कुलकर्णी दिवेचा सेंटर ऑफ क्लाइमेट चेंज, भारतीय विज्ञान संस्थान, बंगलूरू से जुड़े हैं। अध्ययन में नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हाइड्रोलॉजी, रुड़की भी संबद्ध है।

शोध पत्रिका सस्टेनेबल एनर्जी टेक्नोलॉजीज एंड असेसमेंट्स के अगस्त अंक में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार, जलवायु परिवर्तन के बावजूद कुछ कम पानी और अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों के लिए डिजाइन की गई रन-ऑफ-द-रिवर परियोजनाएं सालाना बिजली उत्पादन के लिहाज से अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति में रह सकती हैं।

अध्ययन में वर्ष 2100 तक जलविद्युत परियोजनाओं के लिए करीब 0.42 क्षमता कारक बने रहने का अनुमान लगाया गया है। यानी परियोजनाओं की वार्षिक उत्पादन क्षमता पूरी तरह समाप्त होने की स्थिति नहीं होगी, लेकिन वर्ष के अलग-अलग मौसम में बिजली उत्पादन की मात्रा और समय में महत्वपूर्ण बदलाव आ सकता है।

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हिमाचल के लिए क्यों अहम है अध्ययन
हिमाचल प्रदेश में बड़ी संख्या में रन-ऑफ-द-रिवर जलविद्युत परियोजनाएं संचालित हैं। इन परियोजनाओं का उत्पादन नदी में उपलब्ध पानी पर काफी हद तक निर्भर करता है। यदि मानसून में पानी ज्यादा और सर्दियों या सूखे मौसम में काफी कम उपलब्ध होता है तो परियोजनाओं के संचालन और बिजली उत्पादन की योजना को नए सिरे से तैयार करने की जरूरत पड़ सकती है।

अध्ययन यह संकेत देता है कि भविष्य की जलविद्युत परियोजनाओं की योजना केवल सालाना उपलब्ध पानी के आधार पर नहीं बनाई जा सकती। तापमान, बारिश के बदलते पैटर्न और नदी के मौसमी प्रवाह को भी परियोजनाओं के डिजाइन और संचालन में शामिल करना जरूरी होगा।

सूखे मौसम में नदी के प्रवाह में संभावित भारी कमी के साथ मानसून में अधिक बारिश से दूसरी तरह की चुनौतियां भी पैदा हो सकती हैं। इससे जल उपलब्धता के अलावा बाढ़, भूस्खलन और अन्य चरम मौसमी घटनाओं का जोखिम भी बढ़ सकता है।

सूचना, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग, हिमाचल प्रदेश के निदेशक पुष्पेंद्र राणा के अनुसार, यह अध्ययन हिमालयी राज्यों के लिए महत्वपूर्ण चेतावनी है। बदलते मौसमी पैटर्न को देखते हुए भविष्य की जलविद्युत परियोजनाओं में जलवायु-लचीले डिजाइन, चरम मौसम की घटनाओं और नदी के बदलते प्रवाह को ध्यान में रखना जरूरी होगा।
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