याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर गुहार लगाई कि वह अस्थायी नौकरी के कारण शिमला में अपनी छोटी बेटी के साथ रह रही है। शिमला से घुमारवीं की दूरी 110 किलोमीटर से अधिक है। आर्थिक तंगी और 5 साल की मासूम बेटी की देखभाल की जिम्मेदारी के चलते उनके लिए हर पेशी पर इतनी दूर जाना मुमकिन नहीं है। इसलिए इस केस को शिमला ट्रांसफर किया जाए। वहीं, दूसरी ओर पति ने इस मांग का कड़ा विरोध किया। दलील दी गई कि पत्नी ने यह याचिका सिर्फ पति को परेशान करने और मुकदमे को बेवजह खींचने के लिए दायर की है, इसलिए इसे खारिज कर दिया जाना चाहिए। हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद कहा कि वैवाहिक मामलों में पत्नी की सुविधा ही मुख्य विचारणीय बिंदु होना चाहिए। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि कि यदि पत्नी केस ट्रांसफर की मांग करती है, तो पति की असुविधा के मुकाबले पत्नी की सुविधा को देखा जाना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि भारतीय समाज के मौजूदा सामाजिक-आर्थिक ढांचे को देखते हुए, अदालतों को दोनों पक्षों की आर्थिक स्थिति, जीवन स्तर और सुरक्षात्मक माहौल को ध्यान में रखना चाहिए, जहां सामान्य तौर पर पत्नी की सुविधा ही सर्वोपरि है।
हाईकोर्ट ने चंबा नगर परिषद के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के चुनावों पर लगाए गए अपने पुराने स्टे (रोक) के आदेश में बड़ा संशोधन किया है। सुप्रीम कोर्ट की ओर से दिए गए हालिया निर्देशों का पालन करते हुए हाईकोर्ट ने साफ किया है कि विधायक अब अपने वोट का मत का इस्तेमाल कर सकते हैं। इससे पहले हाईकोर्ट ने विधायकों को वोट डालने का अधिकार से रोक दिया था। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि चुनाव का अंतिम परिणाम हाईकोर्ट में लंबित मुख्य याचिका के अंतिम फैसले पर निर्भर करेगा। हाईकोर्ट ने इससे पहले 4 जून 2026 को वंदना कुमारी मामले में एक अंतरिम आदेश जारी किया था। उसी आदेश के आधार पर 8 जून 2026 को वेकेशन जज ने चंबा नगर परिषद के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष पद के चुनाव परिणामों, अधिसूचना और शपथ ग्रहण समारोह पर रोक लगाते हुए यथास्थिति बनाए रखने के आदेश दिए थे।
प्रदेश हाईकोर्ट ने ऊना के गगरेट पुलिस स्टेशन में बाबा राकेश शाह के खिलाफ दुष्कर्म और आपराधिक धमकी के मामले को लेकर दायर एफआईआर को रद्द कर दिया है। अदालत ने पीड़िता के बयानों में विरोधाभास पाते हुए अपने फैसले में स्पष्ट किया है कि मामले में आपसी रंजिश और फंसाने की साजिश प्रतीत होती है। न्यायाधीश संदीप शर्मा की अदालत ने मामले के सभी साक्ष्यों और दस्तावेजों का गहराई से अवलोकन करने के बाद कहा कि सीआरपीसी की धारा 164-ए के तहत त्वरित मेडिकल जांच जरूरी होती है। घटना के नौ साल बाद मेडिकल जांच कराने से कोई ठोस सबूत नहीं मिल सकता। ग्राम पंचायत में हुए पुराने समझौते में बाबा ने अपने अनुयायियों की ओर से महिला को थप्पड़ मारने और अभद्र भाषा के प्रयोग के लिए माफी मांगी थी, इसे दुष्कर्म के प्रयास की स्वीकृति नहीं माना जा सकता।
पुलिस की शुरुआती जांच में बाबा को क्लीन चिट मिल गई थी। बावजूद महिला ने अलग-अलग प्लेटफॉर्म पर शिकायतें की, जो दुर्भावना को दर्शाता है। उल्लेखनीय है कि पीड़िता ने पहले एक अन्य व्यक्ति पर चंडीगढ़ और पंजाब के मुकेरियां में दुष्कर्म का आरोप लगाया था। बाद में उसने अपनी कहानी बदलते हुए बाबा पर भी साल 2016 में दुष्कर्म के प्रयास का आरोप मढ़ दिया। मुकेरियां (पंजाब) के जिस पेरिस होटल में महिला ने दुष्कर्म होने की बात कही थी, पुलिस जांच में वह होटल वहां मिला ही नहीं।पीड़िता ने 2016 की घटना के समय खुद को 16 साल का नाबालिग बताया था, लेकिन प्रस्तुत दस्तावेजों (आधार कार्ड) के अनुसार उसकी जन्म तिथि अधिक थी। इससे साबित हुआ कि कथित घटना के वक्त वह 19 साल की बालिग थी। घटना साल 2016 की बताई गई, लेकिन पुलिस में शिकायत वर्षों बाद दर्ज की गई, जिसका कोई भी संतोषजनक कारण शिकायतकर्ता नहीं दे पाई।