दिवंगत रिखीराम कौंडल प्रदेश की सियासत के मंझे हुए खिलाड़ियों में से एक थे। सरल व्यक्तित्व, ईमानदार कार्यशैली और जन समस्याओं को सजग रहने के कारण अपने हलके के जनता पर उनकी अच्छी पकड़ थी। झंडूता विधानसभा क्षेत्र में कोटधार क्षेत्र की 15 पंचायतों को पिछड़ा घोषित करवाने में उनका अहम रोल रहा। पूर्व मंत्री रिखीराम कौंडल 1974 में लता ठाकुर की अगुवाई में कांग्रेस में शामिल हुए थे।1977 तक बिलासपुर जिला यूथ कांग्रेस के अध्यक्ष रहे और झंडूता से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ा लेकिन, हार गए।
1982 में कांग्रेस का टिकट न मिलने पर आजाद उम्मीदवार के रूप में अपना जनाधार खोजा। इस बार भी उन्हें मात्र 287 वोटों से हार का सामना करना पड़ा। इसके बाद उन्होंने भगवा चोला ओढ़कर सियासत के कदम आगे बढ़ाया अैर 1984 से लेकर अंतिम सांस तक भाजपा के कर्मठ सिपाही के तौर पर सक्रिय रहे। 1985, 1990, 1988, 2003 और 2012 में भाजपा के टिकट पर विधानसभा पहुंचे।
इस दौरान कौंडल ने सहकारिता मंत्री, विधानसभा उपाध्यक्ष, विपक्ष में विधायक दल के उप सचेतक पदों पर रहकर प्रदेश की राजनीति और लोगों में अपनी अलग पहचान बनाई। सत्ता पक्ष हो या विपक्ष रिखी राम कौंडल को झंडूता की जनता उन के विकास के कार्य कोटधार की 15 पंचायतों को पिछड़ा क्षेत्र घोषित करवाने को लोग आज भी याद करते है। कलोल में उप तहसील व बहुउद्देश्यीय तकनीकी कॉलेज, झंडूता में एसडीएम कार्यालय उनके कार्यकाल के प्रमुख विकास के कार्यों में शामिल हैं।
प्रदेश भाजपा में अनदेखी और उपेक्षा का दंश दिवंगत कौंडल को अंतिम सांस तक सालता रहा। पार्टी की वर्षों तक सेवा करने और झंडूता से बतौर विधायक प्रतिनिधित्व करने के बावजूद जीवन के अंतिम पड़ाव में पार्टी से झटका ही मिला। सिटिंग विधायक होने के बावजूद पार्टी ने उनका टिकट काट दिया।
सरकार बनने पर सरकार या संगठन में सम्मानजनक समायोजन का वादा भी पूरा नहीं हो पाया। पार्टी स्तर पर मिले इस बड़े सियासी झटके से कौंडल चाहकर भी उबर नहीं पाए और इसकी टीस अंतिम सांस तक उनके मन में रही। समर्थकों के साथ बातचीत में कौंडल की यह टीस रह रहकर जुबान पर भी आ जाती थी। दुखी मन से कहते थे, उनका टिकट धोखे से काटा गया।