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Shimla News: मधुमक्खी पालन से मोम और रॉयल जैली का भी उत्पादन

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उद्यान विभाग के नवबहार परिसर में किसानों को दिया मधुमक्खी पालन प्रशिक्षण
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फसलों का उत्पादन बढ़ाने में सहायक हैं मधुमक्खियां
संवाद न्यूज एजेंसी
शिमला। मधुमक्खी पालन केवल शहद उत्पादन तक सीमित नहीं है, इससे मोम और रॉयल जैली उत्पाद भी मिलते हैं। इसकी बाजार में भारी मांग है। रॉयल जैली प्रोटीन, विटामिन, अमीनो एसिड और खनिजों से भरपूर एक पौष्टिक पदार्थ है। यह जानकारी उद्यान विभाग शिमला के विषय विशेषज्ञ डॉ. कुशाल सिंह मेहता ने दी।

बदलते जलवायु परिवेश में बागवानी को टिकाऊ बनाने, पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देने और किसानों की आय में वृद्धि करने के मकसद से नवबहार स्थित उद्यान विभाग में सात दिवसीय वैज्ञानिक मधुमक्खी पालन प्रशिक्षण शिविर का आयोजन किया गया। इसमें एफपीओ (फार्मर प्रोड्यूसर आर्गेनाइजेशन) ठियोग के 25 किसानों ने हिस्सा लिया। शिविर में डॉ. कुशाल सिंह मेहता ने शहद की ब्रांडिंग, गुणवत्ता परीक्षण और विपण प्रक्रिया की जानकारी दी। उन्होंने कहा कि मधुमक्खियां प्राकृतिक परागणकर्ता हैं जिनकी सक्रियता से बागवानी फसलों की उत्पादकता में 20 से 30 प्रतिशत तक वृद्धि होती है। शिविर में विभाग के विशेषज्ञ अधिकारियों ने मधुमक्खी पालन की तकनीकी और व्यावहारिक पहलुओं की जानकारी दी। इस दौरान पूर्वी क्षेत्र विषय विशेषज्ञ (मधुमक्खी पालन) डॉ. दलीप सिंह नरगेटा ने मधुमक्खी पालन के मूल सिद्धांतों, छत्ते के प्रबंधन, मधुमक्खियों की नस्लों, व्यवहार, उद्यान विभाग के सेवानिवृत्त उपनिदेशक डॉ. ज्ञान वर्मा ने मौसमी प्रबंधन, रोग नियंत्रण और छत्तों की देखभाल से संबंधित उपाय बताए।
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शिविर के प्रायोगिक सत्रों में दमेश कुमार और राणा ने प्रतिभागियों को छत्ते की संरचना, रानी, नर और श्रमिक मधुमक्खियों की पहचान करना सिखाया। उद्यान विभाग ठियोग के विषय विशेषज्ञ डॉ. जगदीश शर्मा ने विभाग द्वारा संचालित मधुमक्खी पालन योजनाओं और सब्सिडी प्रक्रियाओं की जानकारी दी। इस दौरान सेवानिवृत्त वैज्ञानिक डॉ. दुर्गा दत्त शर्मा सहित विभाग के अन्य सदस्य मौजूद रहे।
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कोट
यह पहली बार है जब किसी एफपीओ को विभाग द्वारा मधुमक्खी पालन पर व्यवसायिक प्रशिक्षण प्रदान किया है। मधुमक्खी पालन वर्तमान समय की आवश्यकता है। यह न केवल शहद उत्पादन का माध्यम है बल्कि बागवानी फसलों के परागण को बढ़ाकर उत्पादन और गुणवत्ता सुधारने का वैज्ञानिक तरीका भी है। यदि हर बागवान अपने खेत या बाग में कुछ छत्ते स्थापित करें तो उसकी आय बढ़ाने के साथ पर्यावरण संरक्षण भी होगा।
-डॉ. सतीश शर्मा, अतिरिक्त निदेशक, बागवानी विभाग, हिमाचल प्रदेश
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