उधर, उपायुक्त सिरमौर ललित जैन ने मामला ध्यान में आते ही सहायक आयुक्त एसएस राठौर की अगुवाई में एक टीम मौके पर भेजी। डीएफओ नाहन वेंकटेश रमन, पशुपालन विभाग के उप निदेशक नीरू शबनम, शिक्षा विभाग के उप निदेशक उमेश बहुगुणा, सीएमओ डॉ. संजय शर्मा मौके पर पहुंचे।
डॉ. संजय शर्मा ने बताया कि चमगादड़ों की एक साथ मौत के कारणों का पता नहीं चल पाया है। स्कूल के स्टाफ और बच्चों से कहा गया है कि वह मृत मिले किसी भी पक्षी अथवा पशु के पास न जाएं। यह वायरस भी फैला सकते हैं।
पशुपालन विभाग की उप निदेशक नीरू शबनम ने बताया कि मृत चमगादड़ों के सैंपल लिए गए हैं। सैंपलों को जांच के लिए नेशनल इंस्टीच्यूट ऑफ वायरल डिजिजिस जालंधर भेजा जाएगा। कुछ सैंपल पुणे लैब भी भेजे जा सकते हैं। इधर, स्कूल की शिक्षिका मनीषा ने बताया कि परिसर में मरे चमगादड़ों को वन विभाग की टीम ने गड्ढे खोदकर उनमें जला दिया है।
उपायुक्त ललित जैन ने कहा कि निपाह वायरस जैसी कोई बात नहीं है। गर्मी की वजह से चमगादड़ों की मौत हुई है। इस बारे में विशेषज्ञों से भी राय ली गई है। इस वायरस से चमगादड़ नहीं मरते, जबकि वह सिर्फ वायरस फैलाते हैं। फिर भी एहतियात के तौर पर सैंपल लिए गए हैं।
पहली बार इतनी संख्या में मृत मिले चमगादड़- स्थानीय ग्रामीणों की मानें तो गांव में इतनी ज्यादा संख्या में चमगादड़ों के मरने की यह पहली घटना है। हालांकि इससे पूर्व इक्का दुक्का चमगादड़ मृत अवस्था में देखे जा चुके हैं।
दक्षिण भारत में निपाह वायरस से मौत के मामले सामने आने के बाद हिमाचल अलर्ट हो गया है। देवभूमि आ रहे सैलानियों की वजह से यहां भी वायरस के पहुंचने की आशंका बढ़ गई है। हालांकि, अभी तक ऐसे लक्षण वाला कोई भी मामला सामने नहीं आया है।
स्वास्थ्य सेवाएं निदेशालय ने सभी सीएमओ को निर्देश जारी कर सावधान रहने को कहा है। स्वास्थ्य सेवाएं निदेशक डॉ. बलदेव कुमार ने कहा कि दक्षिण भारत में निपाह वायरस के मामले सामने आने के बाद से हिमाचल अलर्ट है। अधिकारियों को रूटीन में इस बारे में बता दिया गया है कि वे अपडेट रहें।
क्यों जानलेवा है निपाह वायरस- चिकित्सकों के अनुसार निपाह वायरस तेजी से उभर रहा है। ये जानवरों और इंसानों में गंभीर बीमारी को जन्म देता है। इसका सबसे पहले 1998 में मलेशिया के निपाह कम्पंग सुंगाई से पता चला था। इसीलिए इसका नाम निपाह वायरस रखा गया।
तब इस बीमारी के वाहक सूअर थे। 2004 में बांग्लादेश में कुछ लोग खजूर के पेड़ से निकलने वाले तरल को चखने से इस वायरस की चपेट में आए। उस वक्त इस वायरस का वाहक चमगादड़ था। इसे फ्रूट बैट कहा जाता है। इसके संक्रमण से सांस लेने से जुड़ी गंभीर बीमारी हो सकती है या फिर जानलेवा इंसेफ्लाइटिस भी अपनी चपेट में ले सकता है, जिसमें दिमाग को नुकसान होता है।
इससे मरीज कोमा में भी जा सकता है। इस बीमारी को दूर करने के लिए अभी तक कोई इंजेक्शन नहीं है। 5 से 14 दिन तक इसकी चपेट में आने के बाद यह वायरस तीन से 14 दिन तक तेज बुखार और सिरदर्द की वजह बन सकता है।