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लोकगायक अतुल राजटा ने ब्रह्मखाड़ा लोकगीतों के संरक्षण का बीड़ा उठाया

Mon, 02 Dec 2019 11:11 AM IST
अरविन्द ठाकुर न्यूज डेस्क, अमर उजाला, शिमला
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लोकगायक अतुल राजटा - फोटो : सोशल मीडिया
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तू भस्मअ धुड़ी थोड़ा नाचे, धरती न चोड़े भोले ईशरा...महासुवीं पहाड़ी के ब्रह्मखाड़ा लोकगीत के इस अंतरे का अर्थ है - भस्म से धूसरित भोले ईश्वर तू कम नाचना, क्योंकि कहीं धरती न टूट जाए...। पहाड़ी बोली में यह शिव के तांडव नृत्य का बखान है। सदियों से गाए जाने वाले इस ब्रह्मखाड़ा लोकनृत्य के ऑडियो एलबम को यूट्यूब पर पहाड़ी के युवा लोकगायक अतुल राजटा ने डाला है। अतुल राजटा ने लुप्त होते ब्रह्मखाड़ा लोकगीतों के संरक्षण का बीड़ा उठाया है। 

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ब्रह्मखाड़ा लोकगीतों में शिव, राम और कृष्ण की पौराणिक कथाओं का गायन है। पुराणों के इन आख्यानों को लोकगीतों में पिरोया गया है। इन्हें पहाड़ी परिवेश के अनुरूप गाया गया है। ब्रह्मखाड़ा लोकगीतों को महाशिवरात्रि या इससे पहले सर्दियों में गाया जाता है। यह परंपरा सदियों से चली आ रही है। ब्रह्मखाड़ा लोकगीत को ही आंचली, ऐंचली या जती के नाम से भी जाना जाता है।

सदियों से गाए जा रहे इन लोकगीतों के संरक्षण की ओर बहुत कम कलाकारों का ध्यान है। इस बात का अतुल राजटा को मलाल भी है। 29 साल के अतुल राजटा मूल रूप से जिला शिमला की कोटखाई तहसील की ग्राम पंचायत दरकोटी के गांव गाजटा के निवासी हैं। उन्होंने 20 साल की उम्र में गाना शुरू कर दिया था। पहाड़ी नाटी की उनकी निकाली एलबम उसी समय मशहूर हो गई थी।
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अतुल शिमला समर फेस्टिवल, लवी मेले जैसे बड़े आयोजनों में स्टार नाइट ले चुके हैं। वह रेणुका मेले सहित प्रदेश के कई उत्सवों में अपनी प्रस्तुति दे चुके हैं। अतुल राजटा व्यवसाय से सेब खरीददार हैं। उनके पिता प्रदीप राजटा भी बहुत अच्छा गाते हैं। पिता ने कभी भी व्यावसासिक रूप से गायन नहीं किया। वह अपने आनंद के लिए गांवों में कई आयोजनों में अन्य लोगों के साथ गाते हैं।

कलाकारों को राजनेताओं की कृपा से मिलता है अब मंच 
लोकगायक अतुल राजटा ने बताया कि लोक गायकों को मंच मिलने पर ही जीवनयापन के लायक पैसा मिल पाता है। उन्होंने कहा कि हिमाचल में दुखद यह है कि लोक कलाकारों को राजनेताओं और अधिकारियों की कृपा से ही मंच मिलते हैं। आज मेरिट के आधार पर मंच नहीं मिल रहे।

जिन कलाकारों ने लोक संस्कृति के साथ छेड़खानी की है और सस्ती लोकप्रियता बटोरी है, उन पर नेताओं और अफ सरों की कृपा बरस रही है और जो सदियों पुरानी विरासत को सहेजना चाहते हैं, उन्हें कोई नहीं पूछ रहा।

दरअसल, कलाकारों का चयन करने वाले नेताओं और अफसरों को लोक संस्कृति की समझ नहीं होने के कारण ही लोक संस्कृति के संरक्षकों की इस तरह से उपेक्षा को रही है। यह घातक है। पहले लोक कला के पारखी ही स्टार नाइट तय करते थे, अब नहीं।

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