फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

पांच साल से विरान है बाबा रामदेव की पतंजलि पीठ का भवन, अब खंडहर जैसे हालात

Thu, 22 Nov 2018 01:25 PM IST
राकेश शर्मा, अमर उजाला, सोलन
विज्ञापन
विज्ञापन

चंडीगढ़-शिमला नेशनल हाईवे पर कंडाघाट से चायल की तरफ करीब 10 किलोमीटर आगे साधुपुल के समीप बावा रामदेव का पतंजलि योगपीठ संस्थान प्रोजेक्ट प्रस्तावित है। विवाद की वजह से पांच साल से इसकी कोई पूछ नहीं थी लेकिन अब राज्य सरकार के एक फैसले ने साधुपुल की सरगर्मियां बढ़ा दी हैं। यहां दस करोड़ से तैयार विरान सा भवन है जो खंडहर होने के करीब पहुंच चुका है। 

विज्ञापन


भवन में किसी की आवाजाही नहीं है। जिस जोर-शोर से काम शुरू किया गया था, वर्ष 2013 के बाद उसी अंदाज में थम भी गया। अब सिर्फ चायल जाने वाले पर्यटक सड़क पर खड़े होकर इस भवन को निहार लेते हैं। वक्त के साथ भवन की शोभा भी धुंधली होती जा रही है। पतंजलि योगपीठ प्रबंधन ने भवन के आसपास तारबंदी की थी, जो अब उखड़ चुकी है।

विवादित होने से पूर्व 2013 तक भवन का 90 प्रतिशत काम पूरा हो चुका था। लेकिन अब कई काम ऐसे हैं जो दोबारा करने होंगे। अगर योगपीठ इस केंद्र के संचालन को लेकर सक्रिय होता है तो भवन को दुरुस्त करवाने में काफी कसरत की जरूरत पड़ेगी। दस करोड़ से निर्मित इस भवन में अब भी लाखों रुपये मरम्मत कार्य पर खर्च करने होंगे।

विज्ञापन
Trending Videos
विज्ञापन

सरकार दखल न देती तो लोगों को मिलता फायदा

प्रस्तावित प्रोजेक्ट की देखरेख कर रहे लोकेश्वर शर्मा ने बताया कि वर्ष 2013 में सरकार प्रोजेक्ट में दखल न देती तो अब तक लोगों को लाभ मिल रहा होता। यहां जड़ी-बूटियों का उत्पादन शुरू हो गया होता।
योगपीठ में बन रहे उत्पादों में एलोवीरा, गलोए, कच्ची हल्दी, गोमूत्र व नदी किनारे उगने वाली जड़ी-बूटियों की जरूरत रहती है। इसकी आपूर्ति सोलन समेत पूरे प्रदेश से होती। लोगों को एलोवीरा की खेती का प्रशिक्षण मिलता और उनकी आमदनी में भी बढ़ोतरी होती। लेकिन यह सब समय रहते पूरा नहीं हो सका। 

साधुपुल में होना था जड़ी-बूटियों का क्रय-विक्रय 
साधुपुल में प्रस्तावित पतंजलि योगपीठ में मुख्य तौर पर जड़ी-बूटियों का क्रय-विक्रय होना था। जड़ी-बूटियों को खरीदकर उन्हें आगे बिक्री के लिए प्रस्तुत किए जाने की योजना थी। पतंजलि वैद्य को प्रशिक्षण देने के लिए कार्यशालाएं यहां लगाई जानी थीं।

ऐसे लोग, जो हरिद्वार नहीं जा सकते हैं उन्हें साधुपुल में उपचार मिल सकता था। कई तरह के शोध कार्य व योग शिविर इस केंद्र के माध्यम से किए जाने थे। पतंजलि योगपीठ से जुड़े प्रतिनिधि मानते हैं कि अब दोबारा अनुमति मिलने के बाद प्रोजेक्ट के प्रारूप में भी बदलाव हो सकते हैं।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें