प्रस्तावित प्रोजेक्ट की देखरेख कर रहे लोकेश्वर शर्मा ने बताया कि वर्ष 2013 में सरकार प्रोजेक्ट में दखल न देती तो अब तक लोगों को लाभ मिल रहा होता। यहां जड़ी-बूटियों का उत्पादन शुरू हो गया होता।
योगपीठ में बन रहे उत्पादों में एलोवीरा, गलोए, कच्ची हल्दी, गोमूत्र व नदी किनारे उगने वाली जड़ी-बूटियों की जरूरत रहती है। इसकी आपूर्ति सोलन समेत पूरे प्रदेश से होती। लोगों को एलोवीरा की खेती का प्रशिक्षण मिलता और उनकी आमदनी में भी बढ़ोतरी होती। लेकिन यह सब समय रहते पूरा नहीं हो सका।
साधुपुल में होना था जड़ी-बूटियों का क्रय-विक्रय
साधुपुल में प्रस्तावित पतंजलि योगपीठ में मुख्य तौर पर जड़ी-बूटियों का क्रय-विक्रय होना था। जड़ी-बूटियों को खरीदकर उन्हें आगे बिक्री के लिए प्रस्तुत किए जाने की योजना थी। पतंजलि वैद्य को प्रशिक्षण देने के लिए कार्यशालाएं यहां लगाई जानी थीं।
ऐसे लोग, जो हरिद्वार नहीं जा सकते हैं उन्हें साधुपुल में उपचार मिल सकता था। कई तरह के शोध कार्य व योग शिविर इस केंद्र के माध्यम से किए जाने थे। पतंजलि योगपीठ से जुड़े प्रतिनिधि मानते हैं कि अब दोबारा अनुमति मिलने के बाद प्रोजेक्ट के प्रारूप में भी बदलाव हो सकते हैं।