फिल्म के बाद बढ़ी बाबा से जुड़े स्थानों को जानने की उत्सुकता
बाबा नीम करौली के जीवन पर बनी फिल्म ‘हनुमान अंश’ के चर्चित होने के बाद उनके जीवन और उनसे जुड़े स्थानों को जानने में लोगों की दिलचस्पी बढ़ी है। इसी कड़ी में शिमला का संकट मोचन मंदिर भी चर्चा में आया है। मंदिर से जुड़ी मान्यता इसे बाबा नीम करौली की आध्यात्मिक यात्रा से सीधे जोड़ती है। यही वजह है कि यहां पहुंचने वाले श्रद्धालुओं के लिए मंदिर का धार्मिक महत्व तो है ही, इसके साथ बाबा से जुड़ी स्मृतियां भी इसे खास बनाती हैं।
1962 में शुरू हुआ मंदिर निर्माण, चार साल बाद हुई प्राण प्रतिष्ठा
बाबा नीम करौली महाराज की प्रेरणा से हिमाचल प्रदेश के तत्कालीन लेफ्टिनेंट गवर्नर दिवंगत बजरंग बहादुर सिंह भद्री ने वर्ष 1962 में यहां मंदिर निर्माण का कार्य शुरू करवाया था। शुरुआत में यहां छोटा-सा हनुमान मंदिर बनाया गया। इसके बाद 21 जून 1966 को विधिवत मूर्ति प्रतिष्ठा का कार्य संपन्न हुआ। समय के साथ मंदिर के प्रति श्रद्धालुओं की आस्था बढ़ती गई और जनसहयोग से छोटा-सा मंदिर धीरे-धीरे विशाल धार्मिक परिसर में विकसित हो गया। आज वर्षभर यहां श्रद्धालुओं का आना-जाना लगा रहता है। शिमला की प्राकृतिक सुंदरता और चीड़ के जंगलों के बीच स्थित यह मंदिर धार्मिक आस्था के साथ-साथ शांत आध्यात्मिक वातावरण के लिए भी जाना जाता है।
'संकट मोचन' में छिपी है बाबा नीम करौली की कहानी
संकट मोचन मंदिर न्यास के प्रबंधक अनुप चौहान के अनुसार, हिमाचल प्रदेश में संकट मोचन ऐसी खास जगह है जहां बाबा नीम करौली कुछ समय के लिए कुटिया बनाकर रहे थे। उनका कहना है कि लंबे समय तक बहुत से लोगों को इस तथ्य की जानकारी नहीं थी, लेकिन फिल्म ‘हनुमान अंश’ के बाद बाबा से जुड़ी इस कहानी के प्रति लोगों की उत्सुकता बढ़ी है। उनके अनुसार, संकट मोचन मंदिर को केवल एक मंदिर के रूप में देखना इसके इतिहास को सीमित कर देना होगा। यह स्थान बाबा नीम करौली की आध्यात्मिक साधना, हनुमान भक्ति और शिमला के शांत पहाड़ी वातावरण का अनूठा संगम है।