हाईकोर्ट में लंबित जंगी-थोपन मामले पर बहस के लिए सरकार ने अतिरिक्त समय मांगा है। अदालत ने मामले की सुनवाई अब 27 मार्च 2023 निर्धारित की है। अदालत ने अदाणी समूह और राज्य सरकार दोनों की अपीलों की सुनवाई एक साथ निर्धारित की है। किन्नौर जिले की जंगी-थोपन-पोवारी जल विद्युत परियोजना शुरू से ही विवादों में रही है। विदेशी कंपनी ब्रेकल के बाद अदाणी समूह भी इस परियोजना को नहीं बनाना चाहता है। 960 मेगावाट के महत्वपूर्ण हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट को ब्रेकल को वर्ष 2007 में आवंटित किया गया। कंपनी ने खुद को दिवालिया घोषित कर दिया और अपफ्रंट राशि जमा नहीं करवाई।
इसके बाद यह प्रोजेक्ट अदाणी कंपनी को दिया गया। समूह ने प्रीमियम के तौर पर 280.06 करोड़ जमा किए। बाद में इस परियोजना के टेंडर को रद्द कर दिया गया। ब्रेकल कंपनी ने हिमाचल सरकार से पत्राचार किया और अगस्त 2013 को अदाणी समूह के पार्टनर के तौर पर 280.06 करोड़ की जमा राशि ब्याज सहित वापस करने के लिए आग्रह किया। अक्तूबर 2017 में कैबिनेट मीटिंग में वीरभद्र सिंह सरकार ने फैसला लिया था कि अदाणी समूह को पावर प्रोजेक्ट की 280 करोड़ की अपफ्रंट मनी वापस की जाएगी, लेकिन 5 दिसंबर, 2017 को सरकार ने अदाणी ग्रुप पर दिखाई गई 280 करोड़ रुपये की मेहरबानी वाला यह फैसला वापस ले लिया।
महर्षि मार्कंडेश्वर विश्वविद्यालय (एमएमयू) के विद्यार्थियों से अतिरिक्त ट्यूशन फीस वसूलने पर हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से विस्तृत जवाब तलब किया है। कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश सबीना और न्यायाधीश सत्येन वैद्य की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई अब 11 अप्रैल निर्धारित की है। एमएमयू और उससे संबद्ध मार्कंडेश्वर मेडिकल कॉलेज कुमारहट्टी के करीब 1,200 विद्यार्थियों से 103 करोड़ 96 लाख 53 हजार रुपये की धनराशि अतिरिक्त ट्यूशन फीस के तौर पर वसूलने का आरोप लगाया गया था। इस अनियमितता के लिए मार्कंडेश्वर मेडिकल कॉलेज पर हिमाचल राज्य निजी शिक्षा नियामक आयोग ने 45 लाख का जुर्माना लगाया था। हालांकि, हाईकोर्ट ने 22 जुलाई 2022 को आयोग के इस फैसले पर रोक लगा रखी है। आयोग ने सुनवाई के दौरान पाया था कि वर्ष 2012 से 2020 की अवधि के दौरान लगभग 1,200 एमबीबीएस छात्रों से 103 करोड़ 96 लाख 53 हजार रुपए की अतिरिक्त ट्यूशन फीस वसूली जा चुकी है।
एमएमयू की ओर से दायर याचिका में आरोप लगाया गया है कि हिमाचल राज्य निजी शिक्षा नियामक आयोग की ओर से पारित आदेशों पर पूर्ण कोरम के हस्ताक्षर नहीं किए गए थे। आयोग की ओर से अदालत को बताया गया कि आयोग के दो सदस्यों में से जिन्होंने इस मामले की सुनवाई की थी, एक सदस्य शशिकांत शर्मा ने इस पर हस्ताक्षर नहीं किए। शशिकांत शर्मा ने हस्ताक्षर से इनकार करते हुए कहा था कि उनकी बेटी भी विश्वविद्यालय में नामांकित थी। बता दें कि वर्ष 2013-14 बैच की एमबीबीएस छात्रा निवेदिता राव और यामिनी की शिकायत पर यह आदेश पारित किए हैं। शिकायत की गई थी कि शुरू में उन्होंने अतिरिक्त ट्यूशन फीस की वसूली को लेकर विरोध भी किया था, लेकिन उन्हें ये कहकर धमकाया गया कि फीस न जमा करने पर डिग्री नहीं पूरी होने दी जाएगी। ये भी आरोप लगा था कि एसटी छात्रों को मिलने वाली छात्रवृत्ति का भी संस्थान ने गोलमाल कर लिया था।