इससे अतिरिक्त वित्तीय बोझ सीधे राज्यों पर आएगा। कानून बनाने से पहले राज्यों से वित्तीय दायित्व, मजदूरी दर और रोजगार की मांग जैसे विषयों पर कोई व्यापक परामर्श नहीं किया गया। वर्तमान में गैर-जनजातीय क्षेत्रों के लिए 247 रुपये प्रतिदिन की मजदूरी निर्धारित है। प्रस्तावित अधिनियम में मजदूरी दरों में वृद्धि की कोई अधिसूचना जारी नहीं हुई है, जिससे श्रमिकों के हित प्रभावित होंगे। अनिरुद्ध सिंह ने प्रदेश जैसे पर्वतीय राज्यों की विशेष परिस्थितियों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि प्राकृतिक आपदाओं की संवेदनशीलता, निर्माण कार्यों की अधिक लागत और बिखरी ग्रामीण आबादी को नए आवंटन फार्मूले में पर्याप्त महत्व नहीं मिला है। यदि वास्तविक मांग केंद्र के निर्धारित आवंटन से अधिक होती है, तो पूरा अतिरिक्त व्यय राज्य सरकार को वहन करना पड़ेगा।
ग्राम पंचायतों पर नई जिम्मेदारियां
मंत्री ने बताया कि नए अधिनियम में ग्राम पंचायतों पर कई नई जिम्मेदारियां डाली गई हैं। इनमें विकास योजनाओं का विस्तृत निर्माण, जीआईएस आधारित योजना प्रणाली और पीएम गति शक्ति का एकीकरण शामिल है।
मंत्री अनिरुद्ध सिंह ने बताया कि पहले मनरेगा का पूरा खर्च केंद्र उठाता था। अब इसे हिमाचल जैसे विशेष राज्यों के लिए 90:10 कर दिया गया है। इससे राज्य पर हर साल 164.63 करोड़ रुपये का अतिरिक्त वित्तीय बोझ पड़ेगा। मनरेगा के तहत मिलने वाली मजदूरी भी 320 रुपये से घटाकर 247 रुपये कर दी गई है। उन्होंने यह भी बताया कि केंद्र पर मनरेगा स्टाफ का फरवरी से 20 करोड़ रुपये बकाया है।
उन्होंने भाजपा सांसदों को केंद्र सरकार के सामने हिमाचल के हितों से जुड़े मुद्दों को मजबूती से उठाना चाहिए। मनरेगा में बदलाव से प्रदेश पर पड़ने वाले आर्थिक प्रभाव को लेकर उन्हें अपनी बात रखनी चाहिए। कांग्रेस के पूर्व नेता नीरज भारती की नाराजगी पर अनिरुद्ध सिंह ने कहा कि शिकायतें मुख्यमंत्री के सामने रखनी चाहिए। सार्वजनिक बयान पार्टी की छवि को नुकसान पहुंचाते हैं।