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तीन सप्ताह की नूराकुश्ती के बाद अनिल शर्मा का मंत्री पद से इस्तीफा

Sat, 13 Apr 2019 11:39 AM IST
अरविन्द ठाकुर न्यूज डेस्क, अमर उजाला, शिमला
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अनिल शर्मा - फोटो : अमर उजाला
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हिमाचल के मंडी संसदीय क्षेत्र से बेटे के कांग्रेस टिकट पर चुनाव में उतरने के बाद भाजपा के निशाने पर आए जयराम सरकार में मंत्री अनिल शर्मा ने मुख्यमंत्री के साथ 19 दिन की नूराकुश्ती के बाद पद से इस्तीफा दे दिया है। पिता पंडित सुखराम के साथ बेटे आश्रय के कांग्रेस में शामिल होने के बाद खुद को धर्मसंकट में बताने वाले अनिल पर भाजपा ने इस्तीफे के लिए दबाव बढ़ा दिया गया था।

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हालांकि, उन्होंने खुद इस्तीफा न देने की बात कही थी, लेकिन मुख्यमंत्री के साथ बढ़ती तल्खी के चलते उन्होंने सीएम कार्यालय को अपना इस्तीफा भेज दिया। सिराज दौरे के बीच मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने पार्टी आलाकमान से फोन पर चर्चा करने बाद अनिल शर्मा के इस्तीफे को मंजूर करने का एलान कर दिया। बेशक, अनिल शर्मा ने मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया है लेकिन भाजपा नहीं छोड़ी है। इसके चलते वह अभी मंडी सदर से विधायक बने रहेंगे।

साल 2017 में विधानसभा चुनाव के दौरान अनिल शर्मा समेत पंडित सुखराम का परिवार भाजपा में शामिल हो गया था। मंडी सदर से भाजपा के टिकट पर जीतकर आए अनिल जयराम सरकार में ऊर्जा मंत्री बनाए। लोकसभा चुनाव में मंडी से भाजपा टिकट न मिलने पर उनके बेटे आश्रय और पिता सुखराम फिर कांग्रेस में शामिल हो गए।
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कांग्रेस ने आश्रय को मंडी से प्रत्याशी बनाया है। इसी के बाद अनिल पर भाजपा ने इस्तीफे के लिए चौतरफा दबाव बनाया। मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर एवं अनिल एक-दूसरे के खिलाफ पिछले कुछ दिनों से तीखे हमले कर रहे थे। इसी बीच सीएम के मंडी दौरे के दौरान अनिल ने अपना त्यागपत्र मुख्यमंत्री कार्यालय को भेज दिया। 

इस्तीफे में अनिल ने कहा कि मुख्यमंत्री की ओर से मंत्री के गुम होने वाले बयान से वह आहत हैं। जब सीएम को विश्वास ही नहीं है तो सरकार में रहने का क्या मतलब। इसके साथ ही अनिल ने फिर कहा कि वह न तो मंडी में पार्टी के किसी कार्यक्रम में भाग लेंगे और न अपने बेटे आश्रय शर्मा के लिए प्रचार करेंगे।

अनिल के इस्तीफे  के साथ ही अब उनके भाजपा में बने रहने को लेकर भी चर्चा शुरू हो गई है। जानकारों की मानें तो चूंकि अभी अनिल पार्टी विरोधी गतिविधि में सार्वजनिक तौर पर शामिल नहीं हैं। ऐसे में उनके खिलाफ दलबदल कानून के तहत कार्रवाई नहीं की जा सकती।

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अनिल शर्मा का इस्तीफा स्वीकार : मुख्यमंत्री

भाजपा नेताओं की ओर से इस्तीफे के लिए चौतरफा दबाव बनाने जाने के बीच मंडी सदर से विधायक व मंत्री अनिल शर्मा मंगलवार को ही शिमला आ गए थे। शिमला कैंप करने के दौरान अनिल ने मीडिया में सरकार के खिलाफ सर्जिकल स्ट्राइक से लेकर परिवारवाद और बाई चांस मुख्यमंत्री बनने जैसे बयान के बहाने जयराम पर जमकर हमला किया। 

सिराज दौरे के दौरान मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने बताया कि पार्टी आलाकमान से फोन पर चर्चा करने के बाद अनिल शर्मा के मंत्री पद से इस्तीफे को मंजूर कर लिया है। हालांकि वह अभी भी भाजपा के सदस्य हैं। अगर वह भाजपा के खिलाफ जाकर मंडी संसदीय सीट से कांग्रेस प्रत्याशी अपने बेटे आश्रय के लिए प्रचार करते हैं तो उनका विधायक पद और सदस्यता भी जाएगी।

बेशक, अनिल शर्मा ने मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया है, लेकिन अभी भी वह भाजपा के विधायक हैं। भाजपा विधायक रहते वह कांग्रेस प्रत्याशी बेटे आश्रय के लिए चुनाव प्रचार नहीं कर सकते हैं। अनिल अगर बेटे के पक्ष में प्रचार करते हैं तो एंटी डिफेक्शन  लॉ के तहत उनकी विधायकी चली जाएगी। ऐसे में मंडी सदर से विधानसभा उपचुनाव होगा। सुखराम परिवार पर दलबदल के आरोपों के बीच अनिल शर्मा उपचुनाव की तोहमत भी नहीं लेना चाहते हैं।

मंडी के सराज के थाची में भाजपा अनुसूचित जाति सम्मेलन में सीएम जयराम ठाकुर ने कहा कि भाजपा नियमानुसार अनिल शर्मा के खिलाफ एंटी डिफेक्शन लॉ के तहत कार्रवाई होगी। हालांकि, आचार संहिता खत्म होने के बाद विधानसभा में ही एंटी डिफेक्शन लॉ लाया जा सकता है, जिसमें विस अध्यक्ष का फैसला सर्वमान्य होता है।

उन्होंने कहा कि त्यागपत्र का फैसला अनिल शर्मा के विवेक पर छोड़ा था। उन्हें पहले ही त्यागपत्र दे देना चाहिए था। ऐसे मंत्री की सरकार को जरूरत नहीं जो अपने करीबियों को कांग्रेस प्रत्याशी के लिए प्रचार करने के लिए दबाव बना रहा हो।

यह है एंटी डिफेक्शन लॉ- अधिवक्ता समीर कश्यप के अनुसार आठवीं लोकसभा के चुनावों के बाद 1985 में संसद के दोनों सदनों ने सर्वसम्मति से 52वां संशोधन विधेयक पारित कर राजनीतिक दलबदल पर कानूनी रोक लगा दी। इसे संविधान की दसवीं अनुसूची में डाला गया। मोटे तौर पर 52वें संविधान संशोधन के इस विधयेक में सदस्यता समाप्त करने के प्रावधान किए गए।

यदि दल बदलने वाला स्वेच्छा से अपने दल से त्यागपत्र दे या वह अपने दल या उसके द्वारा अधिकृत व्यक्ति की अनुमति के बिना सदन में उसके किसी निर्देश के प्रतिकूल मतदान करे या मतदान में अनुपस्थित रहे या उसके खिलाफ पार्टी विरोधी गतिविधियों में शामिल होने के तथ्य हों तो 15 दिनों सदस्यता समाप्त होगी। इसमें किसी भी न्यायालय को हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं होगा।
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