कुछ साल पहले पिता को खो चुकी अंशिका ने बताया कि मां समिता टेलर हैं। घर के साथ लगते बाजार में उनकी दुकान है। छोटा भाई है। मां को मेहनत करता देख उसे भी कड़ी मेहनत की सीख मिली। कुल्लू के खराहल की रहने वाली त्रिशा भी साल 2022 में मां को खो चुकी है। पिता नीलचंद पेशे से किसान हैं। रोज पांच किलोमीटर पैदल चलकर स्कूल पहुंचने वाली त्रिशा ने 12वीं कला संकाय में सातवां स्थान हासिल किया है। त्रिशा ने कहा कि पिता चाहते हैं कि वह अफसर बने। इसके लिए पढ़ाई पर पूरा फोकस किया है। टॉपर आने के लिए सम्मान मिलने से और मेहनत की प्रेरणा मिलेगी।
दसवीं की मेरिट में पांचवां रैंक हासिल करने वाली मंडी के तत्तापानी स्कूल की दीपिका को भी उप मुख्यमंत्री मुकेश अग्निहोत्री ने मेडल पहनाकर सम्मानित किया। पिता को खो चुकी दीपिका ने बताया कि मां खेती-बाड़ी कर गुजारा करती हैं। खेती से होने वाली कमाई से पढ़ाई भी चल रही है। रोज छह किलोमीटर पैदल स्कूल जाना पड़ता है। मां के सपने पूरे करने हैं इसीलिए दिन रात मेहनत कर रही हूं। घर पर छोटा भाई है। अब लक्ष्य है कि 12वीं की मेरिट में भी टॉपर बनूं। दीपिका स्कूल शिक्षक के साथ सम्मान लेने शिमला पहुंचीं।
हर बेटी का सपना होता है कि उसकी मेहनत और उपलब्धि पर उसके माता-पिता गर्व करें। जबकि हर पिता के लिए इससे बड़ा कोई सम्मान नहीं है कि उसकी बेटी को मंच पर सम्मानित होते हुए दिखे। चंबा के चुवाड़ी की रहने वाली दसवीं की छात्रा आरूषि को उपमुख्यमंत्री मुकेश अग्निहोत्री ने सम्मानित किया। बेटी की इस उपलब्धि का साक्षी बनने के लिए पिता राकेश कुमार जो भारतीय सेना में हवलदार के पद पर सेवाएं दे रहे हैं, रातभर बस में 10 घंटे का सफर तय कर शिमला पहुंचे। उन्होंने बताया कि बीती रात करीब 8 बजे यात्रा शुरू की। पूरी रात सड़क पर गुजारने के बाद वह सुबह करीब 6 बजे शिमला पहुंचे, लेकिन थकान का अहसास उस समय गायब हो गया जब उन्होंने अपनी बेटी को मंच पर सम्मान प्राप्त करते हुए देखा। राकेश कुमार उनकी पत्नी वीना और बेटी आरुषि ने कहा कि यह पल उनके जीवन के सबसे यादगार क्षणों में से एक है। सेना की जिम्मेदारियों के बीच परिवार को समय देना आसान नहीं होता, लेकिन बेटी की इस उपलब्धि को देखने के लिए वह हर हाल में शिमला पहुंचना चाहते थे। आरुषि ने बताया कि उनकी माता एक गृहिणी हैं और परिवार ने हमेशा उसकी पढ़ाई और प्रतिभा को आगे बढ़ाने के लिए हर संभव सहयोग दिया। उन्होंने बेटी के गले में मेडल देखा तो उन्हें लगा कि उनकी वर्षों की मेहनत और परिवार के त्याग का सम्मान हुआ है।