कोरोना के चलते दो साल बंद रहे स्कूलों में अब कक्षाएं पूरी तरह से शुरू हो चुकी हैं। विद्यार्थियों का कहना है कि कोरोना के दौरान उन्हें एहसास हुआ कि स्कूल के बिना जीवन कितना खाली है। कहा कि स्कूल में मास्टर जी का डर है तो दोस्तों के साथ उठने बैठने और गपबाजी लगाने का मजा भी है।
शिक्षक भी विद्यार्थियों को ऑफलाइन पढ़ाई के माहौल में ढालने और पिछली कक्षाओं की पढ़ाई की भरपाई करने में जुट गए हैं। राजधानी के ऑकलैंड हाउस गर्ल्स स्कूल में दो फरवरी से बोर्ड परीक्षार्थियों की कक्षाएं शुरू हो गई हैं। शिक्षक परीक्षा की तैयारी में बच्चों का सहयोग कर रहे हैं। नॉन बोर्ड कक्षाओं में भी पिछली दो कक्षाओं के साथ अगली कक्षा से जुड़े विषयों को समझाकर पढ़ाई करवाई जा रही है। कक्षा में बैठकर सीखने की क्षमता को बढ़ाया जा रहा है।
व्यायाम और योगा भी शुरू करवाया : जॉन
ऑकलैंड हाउस गर्ल्स स्कूल की प्रधानाचार्य सुनीता जॉन ने कहा कि छात्राओं की दो साल तक घर में रहकर बनी आदतों को सुधारा जा रहा है। कक्षाओं में पढ़ाई करने के लिए उन्हें मानसिक रूप से तैयार किया जा रहा है। छात्रावास में रह रही छात्राओं को सुबह व्यायाम और योगा करवाया जा रहा है। ऑनलाइन कक्षाएं पूरी तरह बंद कर दी हैं।
कक्षाएं कितनी अहम इसका हुआ एहसास : शिखा
कंप्यूटर शिक्षिका शिखा सूद ने कहा कि स्कूल बंद रहने पर उन्हें एहसास हुआ कि कक्षाएं और छात्र उनके जीवन में कितने अहम हैं। अब ऑनलाइन पढ़ाई बंद कर दी है। कक्षाओं में ही पूरे विषय पढ़ाए जा रहे हैं।
ऑफलाइन समझाने में होती है आसानी : रोजी
भूगोल की शिक्षिका रोजी गुप्ता ने कहा कि ऑनलाइन कक्षाओं में मैप रीडिंग जैसे कुछ ऐसे विषय थे जो विद्यार्थियों को ऑनलाइन समझ नहीं आते। अब ऑफलाइन में पढ़ाना आसान हो गया।
लिखने का करवा रहे अभ्यास : शालिनी
हिंदी की शिक्षिका शालिनी ने कहा कि बच्चे लिखना और कक्षाओं में बैठकर पढ़ना भूल गए थे। इन्हें कक्षाओं में लिखने का अभ्यास करवाया जा रहा है। गलतियों को सुधारा जा रहा है।
छात्राओं को करवाए जा रहे प्रोजेक्ट : नीलम
राजनीति शास्त्र की शिक्षिका नीलम ने कहा कि छात्राओं से प्रोजेक्ट बनवाए जा रहे हैं। इससे छात्राओं को पुस्तकालय में बैठने की आदत पड़ रही है। स्कूल ने जरूरी कर रखा है कि प्रोजेक्ट के लिए पाठ्य सामग्री पुस्तकालय से ही इकट्ठा करें। इस वजह से इनमें पुस्तकालय में बैठकर पढ़ने की आदत बन रही है।
90 मिनट बाद बच्चों को ब्रेक जरूरी : नीलम
मनोवैज्ञानिक नीलम ने कहा कि एक बच्चा औसतन 90 मिनट ही ध्यान लगाकर कुछ सीख सकता है। इसके बाद ब्रेक की जरूरत होती है। कोरोनाकाल का सबसे अधिक असर बच्चों पर पड़ा है। स्कूल बंद होने पर बच्चा घर में घुटन महसूस कर रहा था। स्कूल आकर उसका बचपन और उत्साह लौटा है। कहा कि अभिभावक बच्चों को ट्यूशन में न उलझाएं, शिक्षक से ही समझने को प्रेरित करें।
पहले स्कूल बंद होने की हुई थी खुशी : यासमीन
छात्रा यासमीन ने कहा कि दो साल घर रहकर पढ़ाई जरूर की लेकिन कमी रह गई। कोरोना से स्कूल बंद होने पर खुशी हुई थी लेकिन दो साल तक घर पर रहकर पता चला कि स्कूल कितना जरूरी है। ऑनलाइन और आफलाइन कक्षाओं में बहुत अंतर है। अब स्कूल आकर सब अच्छा लग रहा है।
स्कूल में हर सवाल का समाधान : अनन्या
अनन्या सूद ने कहा कि कक्षा में शिक्षक के सामने बैठकर पढ़ने का कोई मुकाबला नहीं। शंका होने पर उसका तुरंत समाधान हो जाता है। दो साल घर पर अनुशासन में रहना, खाने पीने का सारा रूटीन बिगड़ गया था, अब स्कूल खुलने पर सब पटरी पर आने लगा है।