अक्षय तृतीया का पौराणिक महत्व
पौराणिक कथाओं के अनुसार अक्षय तृतीया का दिन कई दिव्य घटनाओं से जुड़ा हुआ है। माना जाता है कि इसी दिन भगवान विष्णु ने परशुराम अवतार लिया था, इसलिए इसे परशुराम जयंती के रूप में भी मनाया जाता है। त्रेतायुग का आरंभ भी इसी तिथि से माना जाता है, जिससे इसकी महत्ता और बढ़ जाती है। इस दिन चारधाम में से एक धाम श्रीबदरीनाथ के कपाट भी खुलते हैं।
अक्षय तृतीया पूजा-विधि
अक्षय तृतीया के दिन सूर्योदय से पूर्व उठकर समुद्र, गंगा या किसी भी पवित्र नदी में स्नान करने का विशेष महत्व बताया गया है। यदि संभव न हो तो घर में ही स्नान करके भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की शांत मन से पूजा करनी चाहिए। इस दिन लक्ष्मी-नारायण की पूजा सफेद या पीले कमल अथवा गुलाब के पुष्पों से करना शुभ माना गया है। नैवेद्य में गेहूं, जौ, चने का सत्तू, मिश्री, नीम की कोपल, ककड़ी और भीगी हुई चने की दाल अर्पित की जाती है। मान्यता है कि इस दिन सत्तू का सेवन अवश्य करना चाहिए, क्योंकि यह शरीर को शीतलता प्रदान करता है और स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी होता है।