सार
संतान की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और खुशहाल जीवन की कामना के लिए हिमाचल प्रदेश में माताएं एक नवंबर को अहोई अष्टमी का व्रत रखेंगी। शिमला में अहोई माता की पूजा का शुभ मुहूर्त शाम 5:36 से 6:54 बजे तक रहेगा। इस दिन माता की पूजा के साथ व्रत कथा सुनने और तारों को अर्घ्य देने की परंपरा है।
संतान की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और सुखी जीवन की कामना के लिए हिमाचल प्रदेश में माताएं एक नवंबर को अहोई अष्टमी का व्रत रखेंगी। कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि पर रखे जाने वाले इस व्रत में महिलाएं दिनभर उपवास कर शाम को अहोई माता की पूजा करेंगी। पूजा के बाद तारों को अर्घ्य देकर संतान की खुशहाली और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना की जाएगी।
गंज बाजार स्थित राधा-कृष्ण मंदिर के पुजारी उमेश चंद्र नौटियाल ने बताया कि पंचांग के अनुसार अष्टमी तिथि एक नवंबर को दोपहर 2:51 बजे शुरू होगी और दो नवंबर को दोपहर 1:10 बजे समाप्त होगी। उदयातिथि के अनुसार अहोई अष्टमी का व्रत एक नवंबर को रखा जाएगा।
उन्होंने बताया कि शिमला में अहोई माता की पूजा का शुभ मुहूर्त शाम 5:36 से 6:54 बजे तक रहेगा। पूजा की अवधि एक घंटा 18 मिनट होगी। शाम करीब छह बजे तारे दिखाई देने की संभावना है। माताएं तारों के दर्शन कर उन्हें अर्घ्य देंगी। वहीं, चंद्रमा के दर्शन के बाद व्रत खोलने वाली महिलाओं के लिए चंद्रोदय का समय रात 11:40 बजे बताया गया है।
सुबह संकल्प, शाम को होगी अहोई माता की पूजा
व्रत रखने वाली महिलाएं सुबह स्नान के बाद पूजा-अर्चना कर संतान की लंबी उम्र और परिवार की खुशहाली के लिए व्रत का संकल्प लेंगी। इसके बाद दिनभर व्रत के नियमों का पालन किया जाएगा। शाम को पूजा स्थल पर अहोई माता का चित्र स्थापित किया जाएगा। कुछ घरों में दीवार पर भी माता का चित्र बनाया जाता है।
पूजा के दौरान रोली, चावल, फूल और भोग अर्पित कर अहोई माता की आराधना की जाएगी। इसके बाद व्रत कथा पढ़ने या सुनने की परंपरा है। पूजा पूरी होने पर महिलाएं तारों के दर्शन कर उन्हें जल से अर्घ्य देंगी और संतान के अच्छे स्वास्थ्य, सुरक्षा तथा उज्ज्वल भविष्य की प्रार्थना करेंगी। व्रत का पारण परिवार की परंपरा के अनुसार किया जाएगा।
मां दुर्गा का स्वरूप मानी जाती हैं अहोई माता
धार्मिक मान्यताओं में अहोई माता को मां दुर्गा का स्वरूप माना जाता है। अहोई अष्टमी का व्रत मुख्य रूप से संतान की रक्षा, दीर्घायु और परिवार में सुख-समृद्धि की कामना से जुड़ा है। इस दिन माताएं श्रद्धा के साथ माता की पूजा कर अपने बच्चों के जीवन में खुशहाली बनाए रखने की प्रार्थना करती हैं।
अहोई अष्टमी से जुड़ी है सेहू के बच्चे की कथा
अहोई अष्टमी की प्रचलित कथा एक साहूकार के परिवार से जुड़ी है। मान्यता के अनुसार साहूकार के सात बेटे, सात बहुएं और एक बेटी थी। दीपावली से पहले घर की लिपाई-पुताई के लिए परिवार की महिलाएं जंगल से मिट्टी लेने गईं। मिट्टी खोदते समय साहूकार की बेटी से अनजाने में सेहू के एक बच्चे की मृत्यु हो गई।
इस घटना से दुखी सेहू ने साहूकार की बेटी को श्राप देने का निश्चय किया। अपनी ननद को बचाने के लिए छोटी बहू ने आगे आकर श्राप स्वयं लेने की बात कही। कथा के अनुसार, इसके बाद छोटी बहू को संतान से जुड़े दुखों का सामना करना पड़ा। परिवार की परेशानी देखकर एक पंडित ने उसे गौ माता की सेवा करने की सलाह दी।
छोटी बहू ने पूरी श्रद्धा से गौ माता की सेवा की। उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर गौ माता ने उसकी सहायता की और सेहू ने भी अपना श्राप वापस ले लिया। इसके बाद उसके जीवन में खुशियां लौट आईं। अहोई अष्टमी पर इस कथा को सुनने और सुनाने की परंपरा है।