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90 साल के इस बुजुर्ग के हौसले के आगे पर्वतारोही भी नतमस्तक, बना डाला कीर्तिमान

Mon, 12 Sep 2016 12:25 PM IST
अशोक राणा/अमर उजाला, केलांग (लाहौल-स्पीति)
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90 साल के बुजुर्ग परस राम के हौसले के आगे बड़े से बड़ा पर्वतारोही भी नतमस्तक हो जाए। उम्र के इस पड़ाव को छूने के बाद अमूमन इंसान शारीरिक दुर्बलता और बीमारियों के कारण बिस्तर का दामन थाम लेता है, लेकिन बुजुर्ग परस राम आज भी आस्था, हौसले और जुनून के दम पर हिमालय के गगनचुंबी पहाड़ों और दर्रों को अपने कदमों से नाप रहे हैं।
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हिमाचल की लाहौल घाटी के गाड़ंग गांव के परस राम कुछ रोज पहले ही समुद्र तल से 16 हजार फुट ऊंचे कुगती दर्रा को पैदल पार कर मणिमहेश दर्शन करके सकुशल घर लौट आए हैं। लगभग 80 किलोमीटर लंबी इस यात्रा को पूरी करने में उन्हें 4 दिन का वक्त लगा। इस दौरान परस राम ने कुगती दर्रा के अलावा पीर पंजाल की 14 से 17 हजार फुट ऊंची कई चोटियों को अपने कदमों से नापा।

परस राम मानते हैं इनका चमत्कार

चंबा में मणिमहेश हिमाचल का एक पवित्र तीर्थ स्थल है, जहां हर साल जन्माष्टमी पर देश भर से लाखों श्रद्धालु महेश (शिव) की मणि का दर्शन करने आते हैं। युवावस्था में परस राम कुगती दर्रा होकर कई दफा पैदल मणिमहेश पहुंचे थे, लेकिन उम्र के इस पड़ाव में पहुंच कर पीर पंजाल की चोटियों को लगातार 4 दिनों तक पैदल चल कर आर-पार करना आसान नहीं है। शिव भक्त परस राम इसके पीछे भोलेनाथ की कृपा मानते हैं।

परस राम का कहना है कि सच्ची आस्था और हौसला हो तो दुनिया में कोई काम नामुमकिन नहीं है। कंचनजंगा हीरो के नाम से भारतीय सेना के मशहूर पर्वतारोही सेवानिवृत्त कर्नल प्रेम कहते हैं कि 90 साल की आयु में पीर पंजाल की चोटियों समेत कुगती दर्रा को पार कर मणिमहेश तक पहुंचना किसी चमत्कार से कम नहीं है।

कई कठिनाइयों का करना पड़ा सामना

परस राम की भगवान शिव के प्रति सच्ची आस्था और उनके जुनून ने मुश्किल चुनौती को पूरा कर दिखाया है। परस राम के पौत्र पाल सिंह ने बताया कि उनके दादा 28 अगस्त को मणिमहेश यात्रा के लिए अकेले घर से निकले। यात्रा पूरी कर वह दो सितंबर को घर सुरक्षित पहुंचे।

जोबरंग-कुगती दर्रा-मणिमहेश ट्रैक करीब 80 किलोमीटर लंबा है। इस दौरान परस को कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। ग्लेशियर में पैदल सफर कर वह मणिमहेश पहुंचे। इस दौरान तीन रातें पहाड़ों में गुजार कर परस अपने लक्ष्य तक पहुंचे। यह रास्ता बर्फ के कारण छह महीने बंद रहता है।
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बीच में यात्रा छोड़ लौट आते हैं कई लोग

यहां अधिकतर समय बर्फ रहती है। 80 किलोमीटर यात्रा को सामान्य लोग करीब छह दिन में पूरा करते हैं। लेकिन बुजुर्ग परस राम के जुनून ने इस यात्रा को मात्र चार दिनों में ही पूरा कर दिया है। बेहद कठिन मानी जाने वाली यह यात्रा बुजुर्गों के लिए बेहद जोखिम भरी

है। ऊंचाई में होने के कारण यहां ऑक्सीजन की कमी रहती है। ट्रैकिंग के दौरान कई युवा लौट जाते हैं। लेकिन परस राम के हौसले और जनून के आगे कुछ टिक नहीं पाया और वह सुरक्षित जाकर घर लौटे।
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