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Exclusive: हिमाचल में 57 औषधीय पौधों पर खतरा, जैव विविधता और पारंपरिक स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली भी संकट में

Sat, 02 Mar 2024 08:36 AM IST
आकाश दुबे हर्षित शर्मा, अमर उजाला, शिमला

सार

अनियंतत्रित शहरी विकास से कई औषधीय पौधों की प्रजातियां विस्थापित हो रही हैं। कृषि विस्तार, जो अक्सर नकदी फसलों की मांग से प्रेरित होता है, इन पारिस्थितिक तंत्रों को खराब करता है।
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औषधीय पौधे (सांकेतिक तस्वीर) - फोटो : फाइल फोटो
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विस्तार
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प्रदेश में पाई जाने वाले जंगली 57 औषधीय पौधों की प्रजातियां खतरे में हैं। यह खुलासा हिमाचल प्रदेश राज्य जैव विविधता बोर्ड की रिपोर्ट में हुआ है। जंगली प्रजातियों के खतरे में पड़ने से न केवल क्षेत्र की जैव विविधता बल्कि इसकी पारंपरिक स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली भी खतरे में है। शहरीकरण, कृषि विस्तार और जलवायु परिवर्तन इन अमूल्य वनस्पति संसाधनों की गिरावट में योगदान करते हैं।

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अनियंतत्रित शहरी विकास से कई औषधीय पौधों की प्रजातियां विस्थापित हो रही हैं। कृषि विस्तार, जो अक्सर नकदी फसलों की मांग से प्रेरित होता है, इन पारिस्थितिक तंत्रों को खराब करता है। इसका परिणाम जैव विविधता का नुकसान और पारंपरिक उपचार पद्धतियों के लिए महत्वपूर्ण औषधीय पौधों का भंडार कम होना है। जलवायु परिवर्तन ने समस्या को बढ़ा दिया है, जिससे विशिष्ट औषधीय पौधों की वृद्धि के लिए महत्वपूर्ण वर्षा पैटर्न और तापमान में बदलाव आ रहा है। इनमें से कई प्रजातियां विशिष्ट ऊंचाई और जलवायु परिस्थितियों के अनुकूल हैं, जिससे वे मामूली पर्यावरणीय बदलावों के प्रति भी अत्यधिक संवेदनशील हो जाती हैं।

व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए अत्यधिक कटाई एक और खतरा पैदा करती है। पारंपरिक प्रथाओं और प्राकृतिक उपचारों में वैश्विक रुचि दोनों के कारण हर्बल दवाओं की बढ़ती मांग, जंगली आबादी पर भारी दबाव डालती है। अनियमित जंगलों की कटाई से इन पौधों की कमी हो सकती है। स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र बाधित हो सकता है। और औषधीय पौधों के संसाधनों की स्थिरता को खतरा हो सकता है।
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ये प्रजातियां हैं खतरे में
हिमाचल प्रदेश राज्य जैव विविधता बोर्ड की रिपोर्ट के मुताबिक जंगली इलाकों में मिलने वाला मोहरा, अटीस, मीठा तेलिया, चोरा, रतनजोत, झरका, कशमल, भोज, काला जीरा, तेजपत्ता, सुरंजन कड़वी, सलाम पंजा, सलपरनी, पत्थर लौंग, शिंगली मिंगली, सोमलता, ककोली, कुकटी, जीवक, रिशबक और खुरायनी अजवायन खतरे में है। इनके अलावा बसंत, जुफ्फा, हुबर, धूप, क्षीर ककोरी, वृधी, रिधी, जटामंशी, गौजवान, ततपलंगा, दुधिया बाच, करू, सलाम मिश्री, रेवंद चीनी, ब्रह्म कमल, भूटकेसी, नेर धूप, चौरत्य, लोध, बिरमी, प्रश्नपरणी और टिमरू की जंगलों में मिलने वानी दुर्लभ प्रजातियां शामिल हैं।
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