मंडी/रिवालसर। विश्व पर्यटन के नक्शे में अपना स्थान बनाने वाली और जिला मंडी के धार्मिक स्थलों में अहम मानी जाने वाली ऐतिहासिक पावन झील रिवालसर अब गंदे पानी से दूषित नहीं होगी। त्रिवेणी धर्मस्थली एवं पर्यटन नगरी रिवालसर में जल्द सीवरेज सुविधा लोगों को मिलेगी।
नपं रिवालसर से सटी रियुर पंचायत के चलहर में सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट बनाने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। इससे अब पवित्र झील में नगर पंचायत की गंदगी नहीं घुलेगी। रिवालसर क्षेत्र की यह दशकों से चली आ रही मांग लंबित थी। जिसके पूरा होने से जल्द ही यहां पर स्वच्छता के नए मानक स्थापित होंगे। झील में कुछ माह पहले हजारों मछलियां पानी दूषित होने से मर गई थीं।
इस त्रासदी के बाद झील के संरक्षण के लिए एसडीएम बल्ह की अध्यक्षता में एक कमेटी का गठन किया गया था। इस कमेटी को झील का जिम्मा सौंपा गया था। इस कमेटी ने यहां पर स्वच्छता बनाए रखने के लिए कई सुझाव दिए थे। यहां पर सीवरेज की सुविधा न होना भी झील के पानी के गंदा होने का अहम कारण माना गया था। कमेटी ने भी नपं को यहां पर सीवरेज की सुविधा विकसित करने की सलाह दी थी।
लंबित मांग पूरी होने पर प्रतिनिधि गदगद
रिवालसर नगर पंचायत के अध्यक्ष लाभ सिंह ठाकुर, उपाध्यक्ष महेंद्र कुमार, पार्षद सागर कमल, रोजी सोनी, मीना गुप्ता, लीला वशिष्ठ, मनोनीत पार्षद विजय कुमार, अनीता गुप्ता और स्थानीय लोगों में नवीन गुप्ता, पवन गुप्ता ने कहा कि सीवरेज सुविधा की मांग लोग अरसे से कर रहे थे। इस सुविधा के शुरू होने से यहां पर स्वच्छता के नए मानक स्थापित होंगे।
जल्द मिलेगी सुविधा : विभाग
आईपीएच विभाग के अधिशाषी अभियंता एनके परमार ने बताया कि विभाग की ओर से काफी समय से निविदा का आवंटन कर दिया गया था। लेकिन, वन विभाग के अनापत्ति प्रमाण के देरी से मिलने के चलते कार्य शुरू करने में देरी हुई। लेकिन, अब कार्य शुरू कर दिया गया है। जल्द लोगों को यहां पर सीवरेज सुविधा मिलेगी।
एक नजर में रिवालसर झील
रिवालसर को हिंदू, बौद्ध और सिक्ख धर्म की त्रिवेणी भी कहा जाता है। मंडी से 24 किलोमीटर दूर सड़क मार्ग से जुड़ा एक प्राचीन तीर्थ है। जहां एक बड़ा सरोवर और सरोवर के निकट ही गुरु पद्मसम्भव की ओर से स्थापित मानी-पानी नामक बौद्ध मठ और एक गुरुद्वारा भी स्थित है।
इसे महर्षि लोमश की तपोभूमि माना जाता है। यहां शंकर, लक्ष्मीनारायण और महर्षि लोमश के तीन मंदिर प्रसिद्ध हैं। रिवालसर सरोवर में सात उभरे हुए भूभाग हैं, उन पर उगे वृक्षों पर देव-मूर्तियां हैं। ऐसा माना जाता है कि मंडी के राजा अर्शधर को जब यह पता चला कि उनकी पुत्री ने गुरु पद्मसंभव से शिक्षा ली है तो उसने गुरु पद्मसंभव को आग में जला देने का आदेश दिया, क्योंकि उस समय बौद्ध धर्म अधिक प्रचलित नहीं था और इसे शंका की दृष्टि से देखा जाता था।
बहुत बड़ी चिता बनाई गई जो सात दिन तक जलती रही। इससे वहां एक झील बन गई जिसमें से एक कमल के फूल में से गुरु पद्मसंभव एक षोड्शवर्षीय किशोर के रूप में प्रकट हुए। वहीं, सिखों के दसवें गुरु गोविंद सिंह भी यहां रुके थे और इस पवित्र भूमि पर उन्होंने अपने शीश रखे थे।