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मशीन ठीक : आईजीएमसी में फिर होगा गुर्दे की पत्थरी का इलाज

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सुमित ठाकुर
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शिमला। आईजीएमसी के यूरोलॉजी विभाग में गुर्दे की पत्थरी का इलाज आज से फिर शुरू हो जाएगा। दो हफ्तों से खराब लिथोट्रिप्सी मशीन की मरम्मत कर ली गई है। अस्पताल की छठी मंजिल पर शनिवार को मशीन ठीक करने के बाद दोबारा इंस्टाल कर दी गई। अस्पताल प्रशासन का दावा है कि नियमित इलाज के साथ साथ पिछले दिनों लंबित पड़े बिना सर्जरी के इलाज भी अब सुचारु रुप से होंगे। यूरोलॉजी विभाग में स्थापित गुर्दे की पत्थरी के इलाज के लिए लगाई गई मशीन में लगी एक्सरे ट्यूब अचानक खराब पड़ गई थी।
मशीन के खराब होने से मरीज परेशान हो रहे थे। अस्पताल में लगी इस मशीन की मदद से बिना सर्जरी के गुर्दे की पत्थरी का इलाज किया जाता है। लेजर तकनीक से यह पत्थरी बिना दर्द के निकाली जाती है, लेकिन मशीन में लगे एक्सरे ट्यूब पार्ट के खत्म होने के बाद मशीन ने काम करना बंद कर दिया था। इस कारण लगभग तीस से अधिक मरीजों को दी गई डेट के मुताबिक बिना सर्जरी के इलाज के लिए दस से बारह दिनों का और इंतजार करना होगा। उधर यूरोलॉजी विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. पीके पुरी ने बताया कि मशीन में लगने वाली एक्सरे ट्यूब दिल्ली से दुरुस्त होकर अस्पताल पहुंच गई है। मशीन में इसे लगा दिया गया है। अब गुर्दे की पत्थरी का इलाज करवाने आने वाले मरीजों का इलाज शुरू होगा।
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सस्ती दरों पर मिलता है इलाज
अस्पताल में नवंबर 2015 में मशीन का उद्घाटन किया गया था। इस तकनीक की मशीन के स्थापित होने के और बिना सर्जरी के इलाज से गुर्दे की पत्थरी का इलाज करने वाला पहला राज्य भी बन गया था। इस दौरान इलाज में करीब सात हजार से अधिक खर्चा इलाज में आता है। जबकि निजी अस्पतालों में इस बीमारी के इलाज के लिए करीब पच्चीस से तीस हजार रुपये का खर्चा आता था।
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बार-बार आती है खराबी
अस्पताल में जब से यह मशीन स्थापित की गई है। तब से इस मशीन में कुछ न कुछ खराबी चलती ही रहती है। हालांकि प्रशासन दावा करता है मशीन के ज्यादा वर्कलोड के कारण मशीन में खराबी आती है। इससे पहले शॉक वेव जेनरेटर का पार्ट खराब होने के कारण मशीन करीब दस माह तक बंद रह चुकी थी।
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किडनी स्टोन के ऑपरेशन होते हैं अहम
लिथोट्रिप्सी मशीन प्रदेश में एकमात्र आईजीएमसी में लगाई गई है। इससे पहले यहां से मरीजों को पीजीआई चंडीगढ़ जाना पड़ता था। इस मशीन से किडनी स्टोन के मरीजों का बिना चीरफाड़ किए लेजर तकनीक से पत्थरी को तोड़ कर निकाला जाता है। इस मशीन से 30 एमएम तक की पत्थरी को निकाला गया है। इससे पहले बड़ी पत्थरी होने पर डॉक्टर ऑपरेशन करने से इंकार करते थे। ऐसे में मशीन आने के बाद मरीजों को खासा लाभ मिला है।
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