फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

पार्षद सैर सपाटे में व्यस्त, सुझाव देने तक की फुर्सत नहीं

विज्ञापन
विज्ञापन
अमर उजाला ब्यूरो
विज्ञापन

शिमला। शहर के चुने हुए पार्षद सैर सपाटे में इतने व्यस्त हो गए हैं कि इन्हें जनता को राहत देने के लिए बनाई जा रही पेयजल पॉलिसी पर सुझाव तक देने का समय नहीं। पेयजल कंपनी ने करीब 20 दिन पहले पार्षदों को पत्र लिखकर सुझाव देने को कहा था। लेकिन हालत ऐसी है कि अब तक 34 में से महज तीन पार्षदों का जवाब कंपनी के पास पहुंचा है।
सदन में हर बार पानी का मुद्दा उठाने वाले पार्षद अब सुझाव तक नहीं दे रहे। मर्ज एरिया में आने वाले शहर के 18 वार्डों के हजारों लोग आज भी महंगा पानी पीने को मजबूर हैं। घर अवैध होने के कारण इन्हें घरेलू कनेक्शन नहीं मिल रहे। व्यावसायिक कनेक्शन से मिल रहा पानी तीन गुना तक महंगा है। कंपनी ने इन्हें राहत देने के लिए पार्षदों से सुझाव मांगें थे। दावा है कि इन सुझावों की रिपोर्ट बनाकर सरकार को भेजी जाएगी। अंतिम फैसला सरकार लेगी कि राहत देनी है या नहीं। लेकिन सरकार को तो तब रिपोर्ट जाएगी जब पार्षद अपने सुझाव देंगे। जनता के चुने हुए प्रतिनिधि यदि गंभीरता दिखाते तो अब तक मामला सरकार के पास पहुंच गया होता।
विज्ञापन


सवालों के घेरे में कंपनी
नगर निगम सदन में पहले भी कई बार यह मामला उठ चुका है। पानी की नई दरें तय करने के लिए बुलाए सदन में पार्षद दिवाकर शर्मा, शैलेंद्र चौहान ने स्पष्ट किया था कि नई दरें लागू होने से पहले मर्ज एरिया के व्यावसायिक उपभोक्ताओं को घरेलू कनेक्शन दिए जाएं। इस बाबत कमेटी भी बनाई गई। लेकिन कमेटी ने रिपोर्ट दी कि टीसीपी और एमसी के नियमों के अनुसार अवैध भवनों को घरेलू कनेक्शन नहीं दिए जा सकते। अब कंपनी फिर से पार्षदों को सुझाव देने को कह रही है। सवाल यह भी उठता है कि जब पार्षद जनता को राहत देने के लिए पहले ही एकमत है तो फिर बार-बार सुझाव क्यों मांगें जा रहे हैं? साथ ही यदि पार्षद सुझाव देते भी हैं तो क्या सरकार इनके मुताबिक राहत देगी?
विज्ञापन


दूसरे का सिस्टम देख आए, अपने के लिए वक्त नहीं
सैकड़ों किलोमीटर दूर हैदराबाद और भुवनेश्वर शहर में जाकर पेयजल तथा सीवरेज सिस्टम का जायजा लेने वाले पार्षदों के पास अपने शहर की व्यवस्था देखने का वक्त नहीं है। निगम में शायद ही ऐसा कोई पार्षद होगा जिसने लालपानी, मल्याणा या गोलछा सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट देखा होगा। यही नहीं, ज्यादातर पार्षदों को तो यह भी पता नहीं कि अब पानी के बिल कहां और कैसे बन रहे हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर जिन पार्षदों नेे अब तक अपने शहर की पेयजल और सीवरेज ही नहीं देखी वह दूसरे शहरों में जाकर क्या देखेंगे और सीखेंगे?
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें