रोहड़ू। 37 साल बाद सेब बगीचों के एक बड़े भाग पर महामारी की दस्तक ने सेब उत्पादकों में बेचैनी बढ़ा दी है। बगीचों में 1982 में स्कैब महामारी के तौर पर करोड़ों का नुकसान कर चुका है। उस दौर में बीमारी से ग्रस्त सेब सरकार को एमआईएस के तहत खरीदकर नालों में फेंकना पड़ा था। खड़ापत्थर, स्नाबा और आसपास क्षेत्रों के सेब बगीचों में करीब तीन साल पहले स्कैब के हल्के लक्षण दिखे थे। उस समय बागवानी विभाग और बागवानों ने इसे गंभीरता से नहीं लिया। अब देवरीघाट, खड़ापत्थर, स्नाबा और चुंजर के करीब तीस बगीचों में बीमारी का संक्रमण करीब 50 प्रतिशत तक फैल चुका है। बागवानी पर खतरे की इस घंटी से अब सरकार और वैज्ञानिक सचेत हो गए हैं।
स्कैब की रोकथाम को खड़ापत्थर में पहुंचे विशेषज्ञ
खड़ापत्थर में सेब बगीचों में स्कैब के लक्षण की जांच के लिए मंगलवार को एक दिवसीय जागरूकता शिविर हुआ। इसमें खड़ापत्थर, शीलघाट, देवरीधाट, सनाबा, पराउंठी और चुंजर के करीब डेढ़ सौ बागवानों ने हिस्सा लिया। डॉ. उषा शर्मा, डॉ. नीलम और डॉ. देवराज कायथ सहित उप निदेशक उद्यान विभाग और टीम ने लोगों को स्कैब फैलने के कारण और नौणी विवि की ओर से अनुमोदित दवाइयों के छिड़काव की सलाह दी।
सरकार से दवाइयां उपलब्ध करवाने की मांग
हाटकोटी में हिमालयन एपल ग्रोवर की बैठक में स्कैब के संक्रमण के मामले पर चर्चा की गई। सरकार से मांग की कि सरकारी केंद्रों पर स्कैब की रोकथाम के लिए दवाइयां उपलब्ध करवाई जाएं। प्रदेश फल, फूल एवं सब्जी उत्पादक संघ के अध्यक्ष हरीश चौहान ने कहा कि बागवानों को परेशान होने की जरूरत नहीं है। मामला अधिकारियों के ध्यान में लाया गया है। खड़ापत्थर और आसपास स्कैब की रोकथाम को एक सप्ताह में दूसरी बार विशेषज्ञों की टीम दौरा कर चुकी है।