किसान पारंपरिक खेती से मुंह मोड़ने लगे हैं। प्रदेशभर में करीब 10 से 15 प्रतिशत लोग ही पारंपरिक खेती कर रहे हैं। 6 सालों से किसानों का रुझान सब्जियों की तरफ बढ़ा है। कृषि विभाग समय-समय पर लोगों को पारंपरिक खेती के लिए जागरूक करता है और इसके बीज भी सस्ते दामों पर मुहैया करवा रहा है। बावजूद इसके किसान पारंपरिक खेती से पीछे हट रहे हैं।
मक्की और कोदरा जैसी पौष्टिक फसलें लगाना कई क्षेत्रों में किसान छोड़ चुके हैं। बाहरी राज्य में अभी भी पारंपरिक खेती की जा रही है लेकिन शिमला और अन्य क्षेत्रों के लोगों ने पारंपरिक खेती बंद कर दी है। किसानों को सब्जियों के अच्छे दाम मिल रहे हैं जिससे वह अच्छी आमदनी हासिल कर रहे हैं। किसानों का कहना है कि मक्की को बीजने के लिए बहुत मेहनत करनी पड़ती है और इसके दाम भी उतने नहीं मिलते।
इसके अलावा मक्की की खेती को जंगली जानवर भी नष्ट कर रहे हैं। खासकर बंदरों का सबसे अधिक प्रकोप है। सब्जी की खेती में किसानों को कम मेहनत में ज्यादा कमाई होती है। जिला कृषि अधिकारी महेंद्र ने कहा कि किसान पारंपरिक खेती में रुचि नहीं दिखा रहे। हिमाचल में करीब 10 फीसदी लोग ही पारंपरिक खेती कर रहे हैं। किसान सब्जियां उगाने को प्राथमिकता दे रहे हैं।