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भूकंप के झटकों से बिखर गए प्रशासन के इंतजाम

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अमर उजाला ब्यूरो
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शिमला। आपदा से निपटने के लिए वीरवार को करवाई गई मॉकड्रिल में सभी दावों की हवा निकलती दिखी। आईजीएमसी में भूकंप के बाद एक मरीज को पांचवीं मंजिल से निकालने में रेस्क्यू टीम को आधा घंटा लग गया। इस दौरान अस्पताल भवन में फंसे बाकी चार लोगों की सांसें भी अटकी रहीं।
प्रबंधन ने ठीक 9:45 पर माकड्रिल शुरू की। रेस्क्यू टीमें भी पॉजिशन पर थी। एंबुलेंस सायरन बजाती हुई परिसर पहुंची। घायलों को वैन से निकालकर सीधे वार्ड में पहुंचाया जा रहा था। यहां पर अस्पताल में डॉक्टरों की टीम घायलों की बाजूओं में बंधे रिबन को देखने के बाद तत्काल उपचार दे रहे थे। इधर, सभी की निगाहें पांचवीं मंजिल में फंसे उन पांच लोगों को निकालने पर लगी थी। सवा दस बजे इन्हें निकालने का प्रयास शुरू किया गया। इन्हें आधा घंटे बाद भी नहीं निकाला जा सका था।
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राहत कार्य में महकमे की रेस्क्यू टीम की पोल खुलकर सामने आई। 10:40 मिनट के बाद खिड़की के रास्ते से पहला घायल व्यक्ति बाहर निकाला गया। इस दौरान घायलों को लेकर आती एंबुलेंस को परिसर में रास्ता न मिल पाने के कारण कई परेशानियों का सामना करना पड़ा। खुद प्रबंधन को जद्दोजहद करनी पड़ी।
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बाजू में लगा भूरा रिबन, डॉक्टर ने पूछा कहां लगी है चोट
शिमला। जिला प्रशासन की ओर से इस मॉकड्रिल में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस्तेमाल किए जाने वाले नियमों का पालन किया जाना था। आईजीएमसी प्रबंधन को इस बारे में सूचित ही नहीं किया था। मॉॅकड्रिल में घायलों को प्राथमिक उपचार के लिए आईजीएमसी भेजा। घायल इमरजेंसी ओपीडी पहुंचे तो डॉक्टरों मरीजों से पूछते कि आपको चोट कहां लगी है। इसके विपरीत अस्पताल प्रबंधन ने दाखिल होते ही मरीजों की बाजूओं पर लाल (गंभीर), काला (ब्रॉड डेड), पीला (माइनर इंजरी) और हरे रंग का रिब्बन (माइनर इंजरी) वालों के लिए रखा था। उधर, इस मामले पर अस्पताल के चिकित्सा उप अधीक्षक डॉ. राहुल रॉव ने बताया कि इस तरह की दिक्कत आने वाले समय में न हो इसके लिए वह जिला प्रशासन से भी बात करेंगे।
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