सैकड़ों सैहब कर्मचारियों की बढ़ी सैलरी का बोझ शहरवासियों की जेब पर पड़ सकता है। 550 से ज्यादा कर्मचारियों की सैलरी 20 फीसदी बढ़ाने से अब नगर निगम को हर माह करीब 23 लाख रुपये का घाटा उठाना पड़ेगा। उधर, सरकार ने पहले ही निगम को किसी भी तरह के अनुदान देने से हाथ खड़े कर दिए हैं।
18 सितंबर को हुई एजीएम में निगम ने शहरी विकास मंत्री सुधीर शर्मा से अनुदान की भी मांग की थी जिसपर मंजूरी नहीं मिल पाई। ऐसे में इस घाटे को पूरा करने के लिए निगम डोर टू डोर गारबेज कलेक्शन के रेट बढ़ा सकता है।
हालांकि, चुनावी साल में मेयर कुसुम सदरेट ने अभी भी रेट न बढ़ाने की बात कही है लेकिन प्रशासन ने रेट बढ़ाने का प्रस्ताव पहले ही तैयार कर लिया है।
इसके अलावा भाजपा, माकपा और कांग्रेस के ज्यादातर पार्षद भी यूजर चार्जिज बढ़ाने के पक्ष में हैं। निगम हाउस में ये सभी निगम के फंड से सैहब कर्मचारियों की सैलरी न देने की भी बात कह चुके हैं। ऐसे में 28 सितंबर को होने वाली बैठक में इस प्रस्ताव पर चर्चा होगी।
कमाई 29 लाख, खर्चा 52 लाख
सैहब सोसायटी के सभी कर्मचारियों को अक्तूबर से बढ़ी हुई सैलरी दी जाएगी। इसके लिए कुल 52 लाख रुपये प्रतिमाह बजट की जरूरत होगी। सैहब सोसायटी को वर्तमान में यूजर चार्जिज से प्रतिमाह करीब 29 लाख रुपये की आय होती है। इस तरह 23 लाख रुपये सोसायटी निगम के फंड से हासिल करेगी। सैलरी बढ़ाने से पहले कर्मचारियों की सैलरी पर 40 लाख खर्च हो जाते थे।
इतनी बढ़ सकती है गारबेज कलेक्शन की फीस
घरेलू उपभोक्ताओं की डोर टू डोर गारबेज कलेक्शन की फीस 50 से 70 रुपये करने का प्रस्ताव है। कमर्शियल यूजर के लिए यह रेट 20 फीसदी बढ़ जाएंगे। इस तरह एमसी की मासिक आय 18 से 20 लाख रुपये बढ़ जाएगी।
एजीएम की 2015 में हुई बैठक में 10 फीसदी यूजर चार्जिज बढ़ाने को मंजूरी भी मिल चुकी है लेकिन इसे लागू नहीं किया गया। यूजर चार्ज बढ़ाने पर अंतिम फैसला निगम हाउस लेगा।
वेतन बढ़ाने के फैसले पर उठे सवाल
क्लीन सिटी शिमला में 11 दिन तक चली सफाई कर्मियों की हड़ताल और अब अचानक 20 फीसदी वेतन बढ़ाने को लेकर निगम प्रशासन और मेयर-डिप्टी मेयर निशाने पर आ गए हैं। सफाई कर्मचारियों की सैलरी बढ़ाने का फैसला एजीएम और नगर निगम हाउस की नामंजूरी के बावजूद लिया गया।
वीरवार देर शाम जब कर्मचारियों की सैलरी बढ़ाने के लिए बैठक बुलाई गई तो निगम के कई अधिकारियों ने सूचना मिलने के बावजूद इस बैठक से दूरी बनाए रखी। वजह साफ थी कि जिस प्रस्ताव को एजीएम और निगम हाउस पहले ही नकार चुका है, उस पर अब चंद अफसर और मेयर-डिप्टी मेयर कैसे फैसला ले सकते हैं।
यही नहीं, हड़ताल के पहले दिन से निगम प्रशासन 20 फीसदी वेतन बढ़ाने के प्रस्ताव को यह कहकर टालता रहा कि एजीएम ही इसे मंजूरी दे सकती है। लेकिन जब एजीएम ने भी इस प्रस्ताव को नकार दिया तो अचानक प्रशासन ने खुद फैसला ले लिया। सवाल उठता है कि जब प्रशासन कर्मचारियों की मांग अपने स्तर पर पूरा कर सकता था
तो फिर एजीएम बुलाने और बैठकें करने का ड्रामा क्यों किया गया? जनता 11 दिन खुद कूड़ा उठाने को मजबूर हुई, शहर के जंगल और नाले कूड़े से भर गए, इसके लिए कौन जिम्मेदार है। उधर, मेयर कुसुम सदरेट ने कहा कि निगम के पास खुद इतना फंड नहीं है कि इनकी 20 फीसदी सैलरी बढ़ा देते।
क्या यही विरासत लाना चाहती थी भाजपा
माकपा पार्षद शैली शर्मा ने कहा कि निगम हाउस में भाजपा पार्षद और मेयर-डिप्टी मेयर शहर की पुरानी विरासत लौटाने की बात कहकर पिछले निगम का मजाक उड़ाते थे। पूछा कि क्या खूबसूरत शिमला को गंदा करना ही उनका विरासत लौटाना है। शैली ने कहा कि सदन में उन्होंने सैलरी बढ़ाने के प्रस्ताव का समर्थन किया था लेकिन मेयर नहीं मानीं।
ये थे शिमला के लिए भाजपा के अच्छे दिन
कांग्रेस पार्षद अर्चना धवन ने कहा कि सैलरी बढ़ाना अच्छा फैसला है। लेकिन यह पहले क्यों नहीं लिया गया। दो बार एजीएम क्यों बुलाई जब निगम खुद फैसला ले सकता था। खूबसूरत शिमला को दागदार किया गया। क्या भाजपा ऐसे ही अच्छे दिन लाने वाली थी।