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Rani Durgavati Jayanti 2025: जानिए कौन थीं रानी दुर्गावती, जिन्होंने मुगलों की सेना की नाक में किया था दम

Sun, 05 Oct 2025 09:30 AM IST
श्रुति गौड़ लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

Rani Durgavati Jayanti 2025: रानी दुर्गावती का जीवन भारत की नारी शक्ति, स्वाभिमान और संघर्ष का प्रतीक है। इसी के चलते आज उनकी जयंती पर देश उन्हें श्रद्धापूर्वक नमन कर रहा है।
 
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जानिए कौन थीं रानी दुर्गावती, जिन्होंने मुगलों की सेना की नाक में किया था दम - फोटो : instagram
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विस्तार
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Rani Durgavati Jayanti 2025: आज देशभर में गोंडवाना साम्राज्य की महान शासिका रानी दुर्गावती जयंती पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की जा रही है। रानी दुर्गावती न केवल एक वीरांगना थीं, बल्कि एक कुशल प्रशासक और जनकल्याण के प्रति समर्पित शासक भी थीं। रानी दुर्गावती का जन्म 5 अक्टूबर 1524 को हुआ था। गोंडवाना साम्राज्य की इस महान रानी ने अपने जीवन में 52 युद्ध लड़े, जिनमें से 51 में विजय प्राप्त की। उन्होंने न सिर्फ अपने राज्य की रक्षा की, बल्कि जनकल्याण और जल संरक्षण के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय कार्य किए।
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उनका विवाह गोंडवाना साम्राज्य के राजा संग्राम शाह के पुत्र दलपत शाह से हुआ था। विवाह के केवल चार वर्ष बाद राजा दलपत शाह का निधन हो गया, उस समय उनके पुत्र नारायण मात्र तीन वर्ष के थे। इस परिस्थिति में रानी दुर्गावती ने खुद गढ़मंडला से शासन की बागडोर संभाली और लगभग 16 वर्षों तक अत्यंत कुशलता से राज्य का संचालन किया।

अपने शासनकाल के दौरान रानी ने कई मंदिर, मठ, कुएं, बावड़ियां और धर्मशालाएं बनवाईं। जल संरक्षण और जनकल्याण की दिशा में उन्होंने विशेष प्रयास किए। उनकी शासन शैली न्यायप्रिय और जनहितकारी थी। 
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रानी दुर्गावती का शौर्य भी असाधारण था। उन्होंने कई शक्तिशाली शत्रुओं को परास्त किया और गोंडवाना साम्राज्य को मजबूती से संभाले रखा। मुगलों ने कई बार उनके राज्य पर आक्रमण किया, लेकिन उन्होंने हर बार वीरता से मुकाबला किया। इतिहास में दर्ज है कि उन्होंने तीन बार मुगल सेनाओं को पराजित किया।

1564 में मुगल सेनापति आसफ खां ने भारी तोपों और छल के सहारे हमला किया, जिसमें रानी की सेना को भारी क्षति हुई। गले और आंख में तीर लगने के बाद भी रानी ने युद्धभूमि नहीं छोड़ी। अंततः उन्होंने 24 जून 1564 को आत्मबलिदान कर वीरगति प्राप्त की, लेकिन अपने स्वाभिमान और स्वतंत्रता को कभी पराजित नहीं होने दिया।  

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