बेटे और बेटी में भेदभाव की मानसिकता
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बेटे और बेटी में भेदभाव की मानसिकता
भारत में लिंग असमानता के परिणामस्वरूप बालिकाओं को असमान अवसर मिलते हैं। देश में लड़कियों और लड़कों को किशोरावस्था का अनुभव अलग-अलग होता है। जहां लड़कों को अधिक स्वतंत्रता का अनुभव होता है, वहीं लड़कियों को स्वतंत्र रूप से घूमने और अपने काम, शिक्षा, विवाह और सामाजिक रिश्तों को प्रभावित करने वाले निर्णय लेने की क्षमता पर व्यापक सीमाओं का सामना करना पड़ता है। जैसे-जैसे लड़कियों और लड़कों की उम्र बढ़ती है, लैंगिक बाधाएं बढ़ती जाती हैं और वयस्कता तक जारी रहती हैं। राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय बालिका दिवसों के आयोजनों और सरकारी कार्यक्रमों तथा योजनाओं के बावजूद बालिकाओं के प्रति समाज के नजरिये में अब तक कोई खास बदलाव नहीं आ पाया है।
गर्भ में हत्या, बाल विवाह और बालपन में गर्भधारण
केन्द्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण 2019-21 के अनुसार भारत का कुल लिंगानुपात बढ़कर 1020 कन्या हो गया है। लेकिन यह लैंगिक तरक्की सुविधाभोगी और कथित पढ़े-लिखे जागरूक शहरियों के घरों में नहीं बल्कि ग्रामीण इलाकों में हुयी है। शहरों में आज भी प्रति हजार बालकों पर बालिकाओं की संख्या 985 ही है। मतलब यह कि शहरों में जहां गर्भावस्था में भ्रूण परीक्षण की सुविधाएं हैं, वहां बालिका भ्रूण अब भी सुरक्षित नहीं है। ग्रामीण क्षेत्र में लिंगानुपात संतोषजनक होने के बावजूद वहां चिकित्सा सुविधाओं की कमी के कारण नवजात से लेकर 5 साल से कम बच्चों की मृत्यु दर अधिक है जिनमें बालिकाओं का प्रतिशत अधिक है। इसी सर्वेक्षण के अनुसार देश में अब भी 18 साल से पहले 23 प्रतिशत किशोरों का विवाह हो जाता है जिनमें बालिकाएं ही अधिक होती है। सर्वेक्षण में बाल विवाह के कारण 15 से लेकर 19 साल उम्र की 6.8 प्रतिशत लड़कियां गर्भवती या माताएं पायीं गयीं।
बालिकाओं के खिलाफ अपराध भी बढ़े
नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की 2021-22 की रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2022 में कुल 83,350 बच्चों की गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज हुयी जिनमें 20,380 बालक और 62,946 बालिकाएं थीं। बच्चों की यह गुमशुदगी 2012 की तुलना में 7.5 प्रतिशत अधिक थी। इन गुमशुदा बालिकाओं में से 60,281 बरामद तो हुई मगर 1,665 का कहीं पता नहीं चला। बच्चों के खिलाफ अपराधों में भी निरंतर वृद्धि हो रही है। ब्यूरो की रिपोर्ट के अनुसार भारत में 2022 में बच्चों के खिलाफ अपराध के कुल 1,62,449 मामले दर्ज हुए जबकि 2021 में 1,49,404 मामले दर्ज हुए थे। एक साल के अंदर यह वृद्धि 8.7 प्रतिशत थी। वर्ष 2021 में बच्चों के अपहरण के 45.7 प्रतिशत, पोस्को एक्ट के तहत यौन अपराध के 39.7 प्रतिशत मामले दर्ज हुए।
बालिकाओं के खिलाफ यौन अपराध भी बढ़े
भारतीय संस्कृति में कन्या को लक्ष्मी माना जाता है और कई अवसरों पर उनकी पूजा की जाती है। लेकिन समाज में ऐसे दानव मौजूद हैं जिनके कारण हमारे ही देश में देवियों के रूप में पूजी जाने वाली कन्याएं असुरक्षित है। एनसीआरबी की 2021-22 की रिपोर्ट के अनुसार 2021 में यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम 2012 (पोस्को एक्ट) के तहत देश में कुल 62,095 मामले दर्ज हुए थे।
भेदभाव करने वाला समाज आगे कैसे बढ़ेगा
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सन् 2022 में इन मामलों की संख्या बढ़ कर 63,116 हो गयी, जो कि 9.3 प्रतिशत की वृद्धि दर्शाता है। सन् 2021 में बालिकाओं से बलात्कार के 37,511 मामले दर्ज हुये थे जो 2022 में बढ़ कर 38,030 हो गये। इसी तरह यौन हमलों की संख्या में 3.1 प्रतिशत तथा यौन उत्पीड़न में दशमलब शून्य 4 की वृद्धि दर्ज की गयी। महिला पहलवानों द्वारा गत वर्ष लगाया गया यौन उत्पीड़न का मामला लोग भूले नहीं होंगे। पहलवानों ने सरकार पर व्यभिचारी को बचाने का आरोप लगाया था।
भेदभाव करने वाला समाज आगे कैसे बढ़ेगा
भारत तब तक पूरी तरह से विकसित नहीं होगा जब तक कि लड़कियों और लड़कों, दोनों को उनकी पूरी क्षमता तक पहुंचने के लिए समान रूप से अवसर नहीं दिये जाते। प्रत्येक बच्चा अपनी पूरी क्षमता तक पहुंचने का हकदार है, लेकिन उनके जीवन में और उनकी देखभाल करने वालों के जीवन में लैंगिक असमानताएं इस वास्तविकता में बाधा डालती हैं। शिक्षा, जीवन कौशल, खेल और बहुत कुछ के साथ निवेश करके और उन्हें सशक्त बनाकर लड़कियों के महत्व को बढ़ाना महत्वपूर्ण है।
लड़कियों के खिलाफ अत्याचार करने वालों को राजनीतिक आधार पर माफ करना या उनको बचाना घोर सामाजिक अपराध भी हैं। लड़कियों के महत्व में वृद्धि करके हम सामूहिक रूप से विशिष्ट परिणामों की उपलब्धि में योगदान दे सकते हैं, कुछ अल्पकालिक (शिक्षा तक पहुंच बढ़ाना, एनीमिया को कम करना), अन्य मध्यम अवधि जैसे बाल विवाह को समाप्त करना और अन्य दीर्घकालिक उपायों में लिंग-पक्षपाती व्यवस्था को समाप्त करना और लिंग चयन से मुक्ति पाना शामिल है।