आरिफा जान, 33 वर्षीय कश्मीरी महिला हैं जिन्होंने कश्मीर की विलुप्त होती दस्तकारी कला 'नमदा' को जीवनदान दिया। इसके साथ ही इस कला में पारंगत लोगों को समाज में एक नई पहचान दिलाने की कोशिश की। अपने क्राफ्ट मैनेजमेंट कोर्स करने की कहानी बताते हुए कहा कि मैने ये कोर्स बड़े ही चोरी-छिपे शुरू किया था। कोर्स को पूरा करने के बाद मुझे इस दस्तकारी में नई जान फूंकने का मौका मिला। लेकिन इस काम के लिए मुझे कई सारी बाधाओं का सामना करना पड़ा।
इस दस्तकारी से जुड़े लोगों को बहुत कम मेहनताना दिया जाता था। लेकिन आरिफा ने हार नही मानी। तीन दस्तकारों के साथ मिलकर शुरू हुआ ये बिजनेस आज विदेश तक फैल चुका है। आरिफा कहती हैं कि कश्मीर में इंटरनेट सेवा बंद होने से उनके बिजनेस को बहुत नुकसान हुआ है। उन्होंने इस बात की जानकारी प्रधानमंत्री तक भी पहुंचाई।
उन्हें बताया कि अपने व्यवसाय से बेहिसाब फायदा तो नहीं हुआ, लेकिन यह बड़ी तेजी से बढ़ता गया। शुरुआत के तीन साल में उन्हें कुल 4 लाख की बचत हुई, लेकिन अब वे पूरे देश में प्रदर्शनी लगाती हैं। आस्ट्रेलिया, फिनलैंड और कतर में भी उनके कारीगरों के बनाए नमदा कालीन बिकते हैं। वे अमेरिका में हुए इंटरनेशल लीडरशिप प्रोग्राम के लिए भी नामित हुई थीं। यहां उन्होंने कश्मीरी कालीनों पर प्रजेंटेशन भी दिया था। राष्ट्रपति के हाथों सम्मानित होने पर उन्होंने अल्लाह को शुक्रिया अदा किया और कहा कि वो इन सम्मान के लिए शुक्रगुजार हैं।