उनके साहस को देख झांसी की सेना में तैनात एक सैनिक पूरन कोरी से उनका विवाह करा दिया गया। शादी के बाद उनकी मुलाकात रानी लक्ष्मी बाई से एक पूजा के दौरान हुई। झलकारी बाई को देख कर रानी लक्ष्मीबाई हैरान रह गईं, क्योंकि वह बिल्कुल लक्ष्मीबाई जैसी दिखती थीं। जब लक्ष्मीबाई ने झलकारी बाई के साहस के किस्से सुने तो उन्हें झांसी की सेना में शामिल कर लिया। यहां उन्होंने बंदूक चलाना, तलवार और तोप चलाना सीखा।
लक्ष्मीबाई का रूप लेकर दिया अंग्रेजों को चकमा
जब अंग्रेजी सेना ने झांसी के किले पर हमला बोल दिया तो सेनापतियों ने रानी लक्ष्मीबाई के किले से निकल जाने की सलाह दी। युद्ध में झलकारी बाई के पति शहीद हो चुके थे। उन्होंने अंग्रेजों को चकमा देने की योजना बनाई और लक्ष्मीबाई के कपड़े पहनकर सेना का कमान संभाल ली। अंग्रेजों को भनक तक नहीं हुई कि वह झांसी की रानी नहीं, बल्कि झलकारी बाई हैं। झलकारी बाई भी जनरल रोज के कैंप में पहुंच गईं। इस दौरान मौका पाकर झांसी की रानी वहां से दूर निकल गईं। झलकारी बाई को पता था कि जहां वह जा रहीं, वहां सिवाय मौत के उन्हें कुछ नहीं मिलेगा लेकिन अपनी मातृभूमि, राज्य, रानी और राजकुमार की रक्षा के लिए झलकारी बाई ने जान की परवाह तक न की।