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international women's day: जो तूफानों में पलते जा रहे हैं वहीं दुनिया बदलते जा रहे हैं...

Sun, 08 Mar 2020 07:22 AM IST
संजीव कुमार झा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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प्रो. गगनदीप कंग - फोटो : अमर उजाला
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उनके सामने चुनौतियां बेशुमार थीं। मुिश्कलें बेहिसाब थीं। राह में बाधा अटकाने वाले न केवल बाहरी थे बल्कि अपने भी थे। लेकिन समाज के लिए कुछ कर गुजरने की तमन्ना और जज्बे के कारण हर मुश्किल बौनी होती गई । उन्होंने न केवल अपने हौसलों से एक मुकाम हासिल किया बल्कि अपने जैसी हजारों लड़कियों के लिए प्रेरणास्रोत बन गईं। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर पेश है कुछ ऐसी ही बेटियों की उपलब्धियों की दास्तां जिन्होंने अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया...

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जो ठान लिया, वह कर डाला: प्रो. गगनदीप कंग (क्लीनिकल साइंटिस्ट)

रोटावायरस से बच्चों पर हो रहे दुष्प्रभाव व हेपेटाइटिस-ई पर काम करना चाहती थी। क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज, वेल्लोर में जूनियर फैकल्टी के तौर पर काम करते हुए मुझे बताया गया था कि मैं अपना 70 प्रतिशत समय रिसर्च में दे सकती हूं। लेकिन मेरे एचओडी को इस पर आपत्ति की।

उन्होंने कहा कि मैं उनके अंडर में काम कर रही हूं, तो मेरी स्वतंत्र लैब कैसे हो सकती है? मेरे सामने दो ही विकल्प थे, उनके कहे अनुसार काम करती या अपनी मर्जी के रिसर्च के लिए एचओडी के खिलाफ खड़ी होती। मैंने दूसरा विकल्प चुना और दोगुनी मेहनत से अपनी रिसर्च में जुटी रही, अंतत: सफलता मिली।
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अगर मैं उनकी बात सुनती तो उनका कॅरिअर बना रही होती, मेडिकल साइंस को योगदान नहीं दे पाती।अपने आप को तो पहचानिए : लड़कियों से मैं वह कहती हूं, ‘बी योर-सेल्फ’। क्या आप अपने को पसंद करती हैं? आपकी पहचान क्या है? आप खुद क्या हैं? इन बातों को सोचें और जवाब तलाशें। थोड़ा एडजस्ट आप कर सकती हैं, वैसे ही जैसे दूसरे आपके लिए करते हैं। लेकिन अपनी पहचान को कतई न गंवाएं।

''एचओडी ने कहा था, स्वतंत्र रिसर्च-लैब तो नहीं मिलेंगी, वह जो कहें वही करुं, मान जाती तो रोटावायरस टीका तलाशने के बजाय उनका कॅरिअर बना रही होती।''

इसलिए खास...

गगनदीप फिलहाल फरीदाबाद के ट्रांजिशनल हेल्थ साइंस एंड टेक्नोलॉजी इंस्टीट्यूट की कार्यकारी निदेशक हैं। अप्रैल 2019 में विश्व के 51 वैज्ञानिकों की रॉयल सोसाइटी, लंदन में फैलो चुनी गईं। यह सम्मान पाने वाली वह पहली भारतीय महिला हैं। कंग ने बच्चों को संक्रामक रोगों से बचाने के लिए रोटावायरस का टीका विकसित किया।

  •   संदेश : अपने लिए खड़ी होना सीखें।

पैशन, फोकस और अनुशासन जरूरीः मंजुला रेड्डी (सेल बायोलॉजिस्ट)

मंजुला रेड्डी - फोटो : अमर उजाला
लड़कियों से भेदभाव आम है। मैं सौभाग्यशाली हूं कि यह सब सहन नहीं करना पड़ा, लेकिन यह होता है, इनकार नहीं कर सकते। इसे खत्म करने के लिए लड़कियों को निर्णायक और प्रभावशाली भूमिका हासिल करनी होगी।

इसलिए खास...

मंजुला रेड्डी ने बैक्टीरिया की कोशिका के आवरण के व्यवहार पर शोध किया। मंजुला फिलहाल हैदराबाद के सेंटर फॉर सेल्युलर एंड मॉलिक्यूलर बायोलॉजी में सेवा दे रही हैं। उन्हें इंफोसिस अवॉर्ड से नवाजा जा चुका है।
  • संदेश : सबसे जरूरी है कि लड़कियां अपने जीवन का एक कॅरिअर विकल्प जरूर चुनें। ऐसा क्षेत्र चुनें, जिसके लिए आपमें पैशन, फोकस और अनुशासन यह तीनों बातें हों।

दूसरों के लिए जीना: पद्मभूषण डॉ. शेरिंग लैंडल (महिला चिकित्सक)

शेरिंग लैंडल - फोटो : अमर उजाला
लेह से 220 किमी दूर हनले में एक गर्भवती के प्रसव के दौरान नवजात अटकने की सूचना शाम को अस्पताल में आई। मैं अपनी टीम लेकर जीप में रवाना हुईं, पहुंचने में सुबह हो गई। जांच की तो पाया कि बच्चा उल्टा होने की वजह से अटका था, उसकी जान जा चुकी थी।

मृत बच्चे को निकाला गया, महिला बेहोश थी। उसे अस्पताल लेकर आए जहां गहन इलाज के बाद उसकी जान बची। उस दिन एक जान बचाने के लिए साढ़े चार सौ किमी की दौड़भाग ने लद्दाख की महिलाओं के जीवन की दुश्वारियों को करीब से महसूस करवाया। मुझे लगा कि पैसा कमाने के लिए देश में किसी बड़ी जगह जाकर काम करने के बजाय लेह आने का मेरा निर्णय सार्थक हो गया।

शुरुआत ऐसे हुई : हनले खगोल वेधशाला विश्व की सबसे ऊंची जगह पर है। लेकिन आसपास रहने वाली हजारों महिलाओं के स्वास्थ्य पर निगरानी के लिए न साधन थे न जागरुकता। रिगरिन नामग्याल कलोन और पदमा छुस्कित ने बेटी शेरिंग लैंडल को डॉक्टर बनाया, ताकि उनके क्षेत्र में महिलाओं को इलाज मिल सके।
इसलिए खास...
75 साल की महिला चिकित्सक जो 1979 यानी 40 साल से लद्दाख में काम कर रही हैं। यह शेरिंग के प्रयास हैं कि लेह के सोनम नोरबू मेमोरियल राजकीय अस्पताल में 1979 में जहां सालभर में 250 से भी कम प्रसव करवाए जाते थे, उनके रिटायरमेंट के वर्ष 2003 में संख्या तीन हजार तक पहुंच गई। आपको 2006 में पद्मश्री और 2020 में पद्मभूषण सम्मान मिला।

''शिक्षा व स्वास्थ्य यह ऐसे क्षेत्र हैं जहां लड़कियों और महिलाओं को सबसे ज्यादा मदद चाहिए। मेरी आपसे गुजारिश है कि इन क्षेत्रों में बड़ी संख्या में पहुंचें और क्षेत्रीय स्तर पर जाकर काम करेंं, यहां आपकी ज्यादा
जरूरत है।''

 
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भेदभाव को बनाएं अपनी ताकतः डॉ. शिल्पी दत्त (बायोटेक्नोलॉजिस्ट, कैंसर शोधकर्ता)

डॉ. शिल्पी दत्त - फोटो : अमर उजाला
ऐसे परिवार में जन्मी जहां लड़की और लड़के में फर्क नहीं किया जाता। माता-पिता शिक्षा का महत्व समझते थे, इसलिए लड़की के रूप में या अपने पसंदीदा विज्ञान की पढ़ाई के लिए कोई अड़चन नहीं आई। अपने कॅरिअर में मैंने कभी इन भेदभावों को महत्व नहीं दिया, कॅरिअर पर फोकस रहा। मैं जानती हूं कि सभी को ऐसा माहौल नहीं मिलता। हालांकि शिक्षा ने हालात में सुधार किया है।

इसलिए खास...कैंसर के इलाज के दौरान कीमो थैरेपी से डीएनए क्षतिग्रस्त होने व उनके सुधार और शरीर की प्रतिरोधक क्षमता की वजह से आने वाली दिक्कतों पर शोध कर रही हैं। केंद्र के बायोटेक्नोलॉजी विभाग ने जानकी अम्मल नेशनल वीमेन बायोसाइंटिस्ट अवाॅर्ड 2019 के जरिये देश की सर्वश्रेष्ठ युवा बायोसाइंटिस्ट चुना।

''कई बार लड़कियों को भेदभाव की वजह से अपने कॅरिअर को छोड़ते देखा है। मुझे लगता है कि ऐसे मौकों पर लड़कियों को कुछ और मजबूती से खड़े रहना चाहिए।''
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