प्रकाशी तोमर
मैं भी एक रोज बेटी सीमा को लेकर चुपचाप रेंज पहुंची। प्रकाशी बताती हैं- कोच कहन लाग्या दादी तू भी लगा ले एक निशाना, मैंने छर्रा उठाकर निशाना लगा दिया। पहला ही टारगेट पर लगा, लेकिन गांव में मजाक भी खूब उड़ा। बस इसके बाद पोतियों रूबी व प्रीति को भी साथ ले जाने लगी।
यह बात घर पर बच्चों के अलावा किसी को पता नहीं थी। जग में पानी भरकर भूसे के कमरे में काफी देर चुपचाप हाथ को सीधा करके खड़े रहते थे ताकि संतुलन साधने का अभ्यास हो सके। बेटे तो साथ थे लेकिन घर के बड़ों को खेलना पसंद नहीं था।
इसलिए उन्हें कभी कीर्तन में जाना बताया तो कभी मायके। जब चंडीगढ़ में गोल्ड मेडल जीता, तो बेटों ने अपने पिता को दिखाया। अखबार में फोटो आई तो उन्हें खेल के बारे में बताया। खुश करने के लिए बताया कि गोल्ड मेडल में सोना निकलता है।